हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 280, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( २४८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- पुनस्त्रयः॥सामनिरामकौ द्वौ च शूलाश्चाष्टाविमे स्मृताः॥१४॥ अजीर्णान्नवमः प्रोक्तो दशमः परिणामजः ॥ एवं दशप्रकारेण शूलं संभवते नृणाम् ॥१५॥ भुक्तोपरि भवेद्यस्तु सोऽपि ज्ञेयः कफात्मकः॥ जीर्णेऽन्ने च भवेद्यस्तु स ज्ञेयःपरिणामजः॥१६॥ कारणोंसे कुपित हुआ वायु उदरके भीतर वर्तता है फिर उसके किये हुए दश प्रकारके शूल उत्पन्न होजाते हैं ॥१३॥ तीन शूल वात आदिक दोषोंके और तीन दो दोषोंसे मिले हुए शूल और १ साम अर्थात् आमसहित शूल और १ निरामशूल ऐसे आठ प्रकारके तो ये हैं ॥ १४ ॥ और नवमा९ अजीर्णसे उपजा शूल और दशमा परिणामजशूल ऐसे मनुष्योंके दश प्रकारके शूल कहे हैं ॥ १५ ॥ जो भोजन करनेसे पीछे शूल होता है वह कफका शूल कहाता है और भोजन किया हुआ अन्न जर जावे तब शूल उपजे यह परिणाम- शूल कहाता है ॥ १६ ॥ अथ वातशूलका लक्षण । आध्मानमूर्ध्वं च विबन्धनं च जृम्भा तथा वेपथुमर्जनं च ॥ उद्गीरणं स्निग्धमुखातिजिह्वा वातेन शूलं भजते विचिज्ञः॥१७॥ ऊपरले अंगोंमें अफारा हो और मलका बंधा हो, जंभाई आवे,अत्यंत कांपै,वमन और डकार आवें, मुख और जिह्वा चिकनी हो, ये लक्षण वातकी शूलके हैं ॥ १७ ॥ अथ पित्तशूलका लक्षण । तृष्णा विदाहोऽतिरतिर्विमोहः कृच्छ्रेण मूत्रं कटुकास्यता च ॥ स्वेदातिशोषो वदनं च पीतं पित्तात्मकं तं प्रवदन्ति धीराः१८॥ दाह हो, ग्लानि हो, मोह हो, तृषा हो, कष्टसे मूत्र उतरे,मुख कड़ुआ रहे,पसीना आवे,अत्यन्त शोष हो, मुख पीला रहे ये लक्षण हों उसको वैद्यजन पित्तका शूल कहते हैं ॥ १८ ॥ अथ कफशूलका लक्षण । छर्दिस्तथा कासबलासमोह आलस्यतन्द्रा जडतातिशैत्यम् ॥ छर्दि हो, खांसी, जुखाम , मोह, आलस्य, तन्द्रा, जडपना और अत्यन्त शीतलता ये कफसे उपजे शूलमें कहते हैं ॥ अथ द्वन्द्वजशूलका लक्षण । कफात्मकं तद्विषजां वरिष्ठ शूलं भवेद्द्वन्द्वजरोगसंज्ञम् ॥ १९ ॥ त्रिभिस्तु दोषैस्तु त्रिदोषजःस्याद्रक्तेन चैकादश एवमुक्तः॥पित्ता-