हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 281, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंस० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( २४९) त्मकानि प्रभवन्ति यस्य चिह्नानि रक्तस्य च छर्दनं स्यात्॥२०॥ शोषस्तृषाश्वासविदाहकासा भवन्ति रक्तप्रभवेऽतिशूलः॥२१॥ विना वातेन नो शूलं विना पित्तेन नो भ्रमः॥ न कफेन विना च्छर्दिर्न रक्तेन विना तमः ॥ २२ ॥ जो दो दोषोंसे उपजा हो, कफप्रधान वह द्वन्द्वज शूल कहाता है॥१९॥ तीन दोषोंसे उपजा हुआ त्रिदोषज शूल कहाता है और रक्तसे उत्पन्न हुआ ग्यारहवां शूल होता है, जिसके पित्तके लक्षण हों और रुधिरकी छर्दि करे ॥ २० ॥ शोष हो, तृषा हो, दाह हो, खांसी हो, श्वास हो, वह रक्तसे उपजा हुआ शूल कहाता है ॥ २१ ॥ वातके बिना शूल नहीं होता है और पित्तके बिना भ्रम नहीं होता है, कफके बिना छर्दि नहीं होती है और रक्तके बिना अन्धेरी नहीं होती है॥ २२ ॥ अथ सब प्रकारके शूलोंकी चिकित्सा । इति शूलपरिज्ञानमतो वक्ष्यामि भेषजम्॥ येन शूलार्त्तिशमनं शूली संपद्यते सुखम् ॥ २३ ॥ दृष्ट्वा शूलं लङ्घनं पाचनं च वान्तिं चैव स्वेदनं रेचनं वा॥ क्षारं चूर्णं चार्पयेच्छूलशान्त्यै पानाभ्यङ्गान्कासमाने मनुष्ये ॥ २४ ॥ इस प्रकार शूलका निदान तो कह दिया है । अब इनकी औषधोंको कहेंगे जिससे शूलकी पीडा शांत होती है और शूलरोगवाला पुरुष सुखी होता है ॥ २३ ॥ वैद्यजन शूलको देखि लंघन , पाचन, विरेचन, वमन, संस्वेदन इन कर्मोंको करवावे और शूलकी शांतिके लिये क्षारचूर्णको देवे और जो मनुष्यके खांसीसहित शूल हो तो पान, अभ्यंग अर्थात् मालिस करवावे ॥ २४ ॥ अथ शूल तथा गुल्मपर हिंग्वादि क्वाथ । हिङ्गु नागरशटीसुवर्चलं दारुपौष्करघनापुनर्नवाः ॥ क्वाथपानमिति शूलिनां हितं पाचनं जठरगुल्मिनामपि ॥२५॥ हींग, सोंठ, कचूर, कालानमक, देवदार, पोहकरमूल, नागरमोथा, सांठी, इनके क्वाथका पान शूलरोगवालोंको हित है और उदरगुल्मरोगवालोंको यह क्वाथ पाचन है॥ २५ ॥ अथ वातशूलपर हिंग्वादिक्वाथ । हिङ्गु पौष्करशटीसुवर्चलं क्वाथमेवमपि शूलिनां हितम् ॥ वातशूलशमनाय शस्यते पाचनं निगदितं च वर्त्तते ॥ २६ ॥