हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(.२५० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- हींग, पोहकरमूल, कचूर, कालानमक, इनका क्वाथ भी शूलरोगवालोंको हित है। यहक्वाथ वातशूलको शांत करनेके लिये श्रेष्ठ कहा है और यही क्वाथ पाचन भी कहा है ॥ २६ ॥ अथ सैंधवादि चूर्ण । सिन्धूत्थहिङ्गु रुचकं यवानी पथ्यायवक्षारशटीविचूर्णम् ॥ देयं सुखोष्णेन निहन्ति शूलं वातात्मकं वाप्यचिरेण शूलम् ॥ २७ ॥ सेंधानमक, हींग, कालानमक, अजवायन, हरड़ें, जवाखार और कचूरको समान भाग ले चूर्ण बना सुखसे सुहाते हुए गरम २ जलके संग देनेसे वातसे उपजा हुआ शूल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ २७ ॥ अथ हिंङ्ग्वादि चूर्ण । हिङ्गु सौवर्चलं पथ्या यवानी सपुनर्नवा ॥ बालैरण्डो बृहत्यौ द्वे तुवरं त्र्यूषणान्वितम् ॥ २८ ॥ क्षारसौवर्चलोपेतं क्वाथो वा चूर्णितस्तथा॥सद्यो वातात्मकं शूलं हन्ति सद्योविषूचिकाम् २९. हींग, कालानमक, हरड़ें, अजवायन, सांठी, नेत्रवाला, अरंड, दोनों कटेहली, सफेद शिरस, सोंठ, मिर्च पीपल, ॥ २८ ॥ जवाखार, कालानमक, इनका क्वाथ अथवा चूर्ण वातसे उपजे शूलको और विषूचिकाको शीघ्र ही नाश देता है ॥ २९ ॥ अथ तुंबुरुआदि चूर्ण । तुम्बुरुपौष्करहिङ्गु यवानी त्र्यूषञ्च वा त्रिबृहतीलवणेन॥ युक्तमिदं लवणाष्टकचूर्णं भवति शूलनिवारणक्षमम् ॥३०॥ धनियां, पोहकरमूल, हींग, अजवायन, सोंठ, मिर्च, पीपल, तीनों प्रकारकी कटेहली, नमक इन सबोंको युक्तकर चूर्ण बनावे यह लवणाष्टकचूर्ण कहाता है, शूलको शीघ्र ही निवा- रण कर देता है ॥ ३० ॥ अथ एरंडादिक्वाथ । क्वाथो निहन्ति मरुतोद्भवशूलसंघानेरण्डनागरसुवर्चलरामठेन ॥ पथ्यावचेन्द्रयवनागरतोययुक्तं हिङ्गु सुवर्चलयुतं च निहन्ति शूलम् ॥ ३१ ॥ अरंड, सोंठ, कालानमक, हींग अथवा हरड़ें, वच, इंद्रजव, सोंठ, हींग, कालानमक इन- का क्वाथ बना देनेसे वातसे उपजे शूलोंके समूहोंका नाश होता है ॥ ३१ ॥