हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 283, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ७ ] भाषाटीकासमेत। ( २५१) अथ बृहद्धिङ्गुचूर्ण। हिङ्गु नागरषड्ग्रन्था यवानी अभया त्रिवृत् ॥ विडङ्गं दारु चव्यञ्च तुम्बरुकुष्ठमुस्तकाः॥३२॥हपुषा कलशी रास्ना वत्स- का सद्दुरालभा ॥ सितारवी बृहत्यौ च लांगली पञ्चजीरकम् ॥३३॥ पुष्करं तिन्तिडीकं च वृक्षाम्लं चाम्लवेतसम् ॥ द्वौ क्षारौ पञ्चलवणं समं चैकत्र मिश्रयेत् ॥३४॥ मूत्रेण भावनाञ्चै- कां दत्त्वा छायाविशोषिताम्॥बीजपूरकतोयेन भावयेच्च दिन- त्रयम् ॥ ३५ ॥ बिडालपदिकां मात्रां युञ्जीत शूलशान्तये ॥ वातेनोष्णोदकेनापि सितशर्करयान्वितः ॥ ३६ ॥ त्रिफला- क्वाथो मद्येन श्लेष्मरोगे प्रशस्यते॥शूलानाहविबन्धानां मन्दा- ग्रौ गुल्मविद्रधीन् ॥ ३७ ॥ प्लीहोदराणाञ्च पाण्डुज्वरिणां च विशेषतः ॥ निहन्ति देहसंघातं मेघवृन्दं मरुद्यथा ॥ ३८ ॥ हींग, सोंठ, वच, अजवायन, हरडें, निशोत, वायविडंग, देवदार, चव्य, धनियाँ, कूट, नागरमोथा ॥३२॥ हाऊबेर, पिठवण, रास्ना, कूडा, जवासा, सफेद गोकर्णी, दोनों कटेहली, कलहारी, पांचों जीरे ॥३३॥ पोहकरमूल, इमली, बिजौरा, अम्लवेत, जवाखार, सजीखार, पांचोंनमक इन सबोंको समानभाग ले एक जगह चूर्ण बना ॥ ३४ ॥ गोमूत्रमें भावना दे छा- यामें सुखालेवे पीछे बिजौराके रसमें तीन दिनतक भावना देवे ॥ ३५ ॥ पीछे एक तोला प्रमाण इस चूर्णको देनेसे शूलरोग शांत होता है, वातसे उपजे शूलमें गरमजलके सङ्ग देवे ॥ ३६ ॥ और कफसे उपजे शूलमें सफेद खांड़में अथवा त्रिफलाके क्वाथके सङ्ग अथवा मदिराके संग देना हित है और शूल, अफारा, मलका बन्धा, मन्दाग्नि, गुल्मरोग, विद्रधि ॥ ३७ ॥ तिल्ली, उदररोग, पांडुरोग, ज्वर, देहका मुटापा इन सब रोगोंको यह चूर्ण नाशता है जैसे मेघोंके समूहको वायु ॥ ३८ ॥ अथ पित्तशूलचिकित्सा। धात्रीफलं लोहरजश्व पथ्या त्र्यूषं समांशेन विभाव्य त तु ॥ रसेन वा दाडिममातुलुङ्ग्याश्चूर्ण सिताढ्यं च सपित्तशूले३९॥ धात्रीफलादि चूर्ण, आंवला, लोहका चूर्ण, हरड़ें, सोंठ, मिर्च, पीपली इन सबोंको समान भाग ले अनारके रसमें अथवा बिजौराके रसमें भावना देवे पीछे इस मिसरी मिला देनेसे पित्त- शूल शांत होता है ॥ ३९ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu