हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 284, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( २५२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ दाडिमादिचूर्ण । बिडालकं दाडिमपूतनां च धात्रीसमेतं विदधीत चूर्णम् ॥ तन्मातुलुंगस्य रसेन भावितं सपित्तशूलप्रशमाय भक्षेत् ॥४०॥ अनारदाना, हरड़ै, आंवला, इन सबोंका एक २ तोला प्रमाण ले चूर्ण बना फिर बिजौराके रसमें भावना देवे। यह चूर्ण पित्तशूलको शांत करता है ॥ ४० ॥ अथ जीवन्त्यादि घृत । जीवन्त्याद्यं घृतं पाने क्षीरं वापि सितान्वितम् ॥ कर्त्तव्यं रेचनं नित्य पित्तशूलनिवारणम् ॥ ४१ ॥ जीवंतीआदि औषधगणमें सिद्ध किया हुआ घृत अथवा मिश्रीसे युक्त दूध इनके जुलाबसे निश्चय पित्तशूलका निवारण होता है ॥ ४१ ॥ अथ पित्तशूलका दूसरा उपचार । शिशिरसरस्तोयागाहन चन्दनानि विशदघुटितमध्ये स्वापनं वै निशासु ॥ कनकरजतकांस्याम्भोजहैमं तुषारं कृतमिति विधिना वै पैत्तिके शूलहेतोः ॥ ४२ ॥ सरोवरके ठंढ़े जलसे स्नान करना, चंदन लगाना, उत्तम चौगरदे घेरवाले मकानमें रात्रिमें शयन करना और सुवर्ण, चांदी, कांशी, कमल, इनकी ठंढकसे शीतलता करनी ये विधि पित्तशूलमें करनी चाहिये ॥ ४२ ॥ अथ पित्तशूलमें भोजन । सितशाल्योद्भवा लाजाः सितामधुयुतं पयः ॥ दाहं पित्तज्वरं छर्दिं सद्यः शूलं निहन्ति च ॥४३॥ जाङ्गलानि च मांसानि भोजनाथ प्रशस्यते॥घृतं क्षीरं समधुरं प्रशस्तं पित्तशूलिनाम्॥४४ सफेद सांठी चावलोंकी खील, मिश्री, शहद इनसे युक्त दूध ये दाहको, पित्तज्वरको, छर्दिको और पित्तशूलको नाशती हैं ॥ ४३ ॥ और जांगलदेशके जीवोंका मांस भोजनके वास्ते श्रेष्ठ कहा है और घृत, दूध, शहद ये पित्तशूलवालोंको हित हैं ॥ ४४ ॥ अथ कफशूलचिकित्सा । लङ्घनं वमनं चैव पाचनं श्लेष्मशूलिनाम् ॥ न घनातिमधुराणि शयनं च विधेयकम् ॥ ४५ ॥