हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( २६५ )
हैं ॥ ५ ॥ रोगसे आक्रांत होनेसे अथवा विषमशयन करनेमें अथवा मन्द ज्वरसे यह क्षयरोग होजाता है और कफसे, पित्तसे अथवा वायुसे इन तीन प्रकारोंसे देहमें क्षय- रोग होता है ॥ अथ क्षयरोगके प्रकार । रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्रगतस्तथा ॥ एवं दशविधा नॄणां क्षया देहे भवन्ति वै ॥६॥ पुनश्चैषां लक्षणानि सावधा- नतया शृणु ॥ ७ ॥ और रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य इन सात धातुओंमें होता है, ऐसे मनुष्यके शरीरमें दश प्रकारके क्षयरोग कहे हैं ॥ ६ ॥ अब फिर भी इनके लक्षणोंको कहते हैं सुनो ॥ ७ ॥ अथ वातक्षयका निदान । अतिस्वेदातिघर्मेण चिन्ताशोषभयादिना ॥ वाताद्यः सेवितैश्चापि जायते मारुतक्षयः ॥ ८॥ अत्यंत पसीना, अति घाम, चिंता, शोष, भय इत्यादिकोंसे और वायुको करनेवाले पदा- र्थोंके सेवनेसे वायुका क्षय होजाता है ॥ ८ ॥ अथ वातक्षयका लक्षण । तेन तन्द्राऽङ्गदाहश्च पिपासारुचिवपथुः ॥ तमः क्लमो भ्रमश्चैव भवेच्च मारुतक्षये ॥ ९ ॥ उससे तन्द्रा, अंगमें दाह, तृषा, अरुचि, कंपना, अंधेरी, ग्लानि, भ्रम ये उपद्रव वातके क्षयरोगमें होते हैं ॥ ९ ॥ वातक्षयमें सेव्यपदार्थ । तस्मादानूपानि सेव्यानि रसानि पललानि च ॥ रसोनादिककल्कञ्च सेव्येद्वातनाशने ॥ १० ॥ इसलिये वातको नाश करनेवाले रस और अनूपदेशके मांसोंका सेवन करे और लहसुनआ- दिक औषधोंके कल्कके सेवनेसे भी वातका नाश होता है ॥ १० ॥ अथ पित्तक्षयके हेतु । पित्तक्षयेऽग्निमान्द्यं च जायतेऽरुचिजाड्यता ॥ कासहृल्लासशोफश्च जायते मन्दचेष्टता ॥ ११ ॥