हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ क्षयरोगमें पापरूपी कारण । देवानां प्रकरोति भङ्गमथवा भ्रूणस्य सन्तापनं गोपृथ्वीधर- विप्रबालहननं चा रामविध्वंसनम् ॥ सोऽयं स्थानविनाशनं च कुरुते स्त्रीणां वधं यो नरस्तस्यैतैर्गुरुकर्मभिः क्षयगदो देहार्थहारी महान् ॥२ ॥ देवानां दहतो धनं च दहतो भ्रूणप्रपातेऽपि च देवत्वं हरतो विषं च ददतश्चारामकं निघ्नतः ॥ तेनासौ नियमेन सम्भवति वै नृणां च तीव्रा रुजा धातूनां क्षयकारिणी च मनुज- स्यात्मापहा दारुणा ॥ ३ ॥ क्षयो दशविधश्चैव विज्ञातव्यो भिषग्वरैः ॥ ४ ॥ जो पुरुष देवताओंकी मूर्तिको तोड़देता है और गर्भगत जीवको सन्ताप देता है, गौ, राजा, ब्राह्मण, बालक इनकी हत्या करता है और बगीचाका विध्वंस करता है, किसीके स्थानका विनाश करता है और जो स्त्रियोंका वध करता है उसके इन कर्मोंसे देहको नाश- करनेवाला महान् क्षयीरोग होता है ॥ २ ॥ जो पुरुष देवताओंको दग्ध करे, किसीके धनको दग्ध करे और गर्भको गिरावे, देवताके द्रव्यको हरे, विष देवे, बाग बगीचेका नाश करे इन विपरीतकर्मोंसे मनुष्यके अतितीव्र पीडा होती है, धातुओंको क्षय करनेवाली और आत्माको नाश करनेवाली दारुण क्षयव्याधि होजाती है ॥ ३॥ वैद्यजनोंको दशप्रकारका क्षयरोग जानना चाहिये ॥ ४ ॥ अथ क्षयरोगके हेतु । श्रमाद्वा भाराद्वा विषमशयनैर्दीर्घचलनैरजीण भोज्याद्वा सुरत- रतिसेवापरतया ॥ ज्वरेणातिक्रान्ताद्विषमशयनाच्छीतलतरैः क्षयं याति श्लेष्मा पवनमथ पित्तञ्च तनुषु ॥ ५॥ रोगाक्रान्ता- द्विषमशयनात्तस्य मन्दज्वराद्वा श्लेष्मापित्तञ्च मरुदथवा याति देहक्षयं वा ॥ श्रम, भार, विषमशयन, दीर्घमार्गमें गमन, अजीर्णमें भोजन, मैथुनमें अतिरमण कर- नेसे और ज्वरसे आक्रांत होनेसे, विषमशयन, अतिशीतल पदार्थका सेवन करनेसे कफ- कोपको प्राप्त होता है, फिर शरीरमें वायुको और पित्तको भी कुपित कर देता १ विषमशयन दोवार है इससे एक जगह कालपरत्व विषमशयन अर्थात् दिनको सोना रातको जागना समझे और दूसरी जगह क्रमपरत्वसे अर्थात् औंधासोना आदि समझें ।