हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 295, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( २६३ ) इसके भक्षण करनेसे कामला, बवासीर पांडुरोग, अतिदारुणज्वर ॥ ३२ ॥ शोक, शोष, संग्रहणी इन रोगोंका नाश होता है और वातरोग, अतीसार, क्षयी, खांसी, गुल्मरोग इनको नाशता है ॥ ३३ ॥ अथ पांडुरोगका पथ्यापथ्य । गोधूमशालयवषष्टिकमुद्गकानां श्यामाढकीघृतयुतं पयसा सत- क्रम् ॥ गाण्डीववास्तुकमथो शतपुष्पवर्त्तापथ्यं हितं निगदितं मनुजस्य पाण्डौ ॥ ३४॥ जाङ्ग्लानि च मांसानि भोजने च प्रशस्यते ॥३५॥ तिलं च रूक्षं कटुकं च तीव्रं दाहात्मकं काञ्जिकभेदकं च ॥ सुराम्लसौवीरकबीजपूरास्तैलानि वर्ज्यानि च पाण्डुरोगे ॥३६॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने पाण्डुरोगचिकित्सा नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ गेहूं, शालीसंज्ञक चावल, जव, सांठी चावल, मूंग, शामक, अरहर इन अन्नोंको घृतके संग अथवा दूधके संग अथवा तक्रके संग भोजन करना हित है और अर्जुनवृक्षके पत्ते, बथुवा, शोफा, वार्त्ताकु इनका शाक पांडुरोगवाले मनुष्यको हित है, पथ्य है॥ ३४ ॥ जांग- लदेशके जीवोंका मांस भोजनमें हित है ॥ ३५ ॥ पांडुरोगमें कडुए, रूखे, चरपरे दाह करनेवाले ऐसे कांजीके भेद, मदिरा, खटाई, कांजी, बिजौरा, तेल इन पदार्थोंको वर्ज देवे ॥ ३६ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने पांडुरोगचिकित्सानामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ नवमोऽध्यायः ९. अथ क्षयरोगकी चिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ शृणु वरभिषां त्वं व्याधिभीमं नराणां भवति विहतचेष्टो वातलप्राणिनां वै ॥ चिरनिचयकरोऽयं प्राकृतैः कर्मपाकैरिह परिभवकारी मानुषस्य क्षयोऽयम् ॥१॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे वैद्योंमें उत्तम! जो मनुष्योंको घोर व्याधि होता है उसको सुनो, वातके स्वभाववाले प्राणियोंके यह रोग होता है, चेष्टाको हत कर देता है और पूर्वजन्मके कर्मविपाकसे नरकको करनेवाला है और इस संसारमें दुःखको करनेवाला यह क्षयरोग होता है ॥ १ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu