हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
(पंचकोल) पीपल १ पीपलामूल २ चव्य ३ चीता ४ सूंठ ५, कटुत्रिक अर्थात् सूंठ, मिर्च, पीपल, नागरमोथा, देवदार, वायविडंग, कंकोल इनको समानभाग ले मिलावे, पीछे इनके समान लोहेका चूर्ण मिलावे ॥२५॥ फिर सब चूर्णसे आठगुने गोमूत्रमें इस चूर्णको पकावे जब पकजावे कड़छीमें चपके तब उतार बेरके समान गुटी बना छायामें सुखा फिर पीस लेवे ॥ २६ ॥ पीछे गायके मथे तक्रमें इसका पना बना सेवन करनेसे कामला, पांडुरोग, बवासीर, अतीसार, मन्दाग्नि, शोष, प्रमेह, गुदाके रोग, कृमि इनका नाश होता है ॥ २७ ॥ अथ अमृतवटक। धात्रीफलानां रसप्रस्थमेकं प्रस्थं तथा चेक्षुरसं विदध्यात् ॥ प्रस्थं तु कूष्माण्डरसप्रदिष्टमार्कंरसं प्रस्थविमिश्रमेकम् ॥२८॥ एकीकृतं मन्दहुताशनेन पाच्यं भवेद्यापदशेषमेति ॥ विमि- श्रयेदौषधसंघमेतत्पलैकमात्रं विपचेच्च पश्चात् ॥ २९ ॥ शृङ्गी सुराह्वं शतपुष्पधान्यं सुगन्ध¹शुण्ठी मधुकं विशाला। सपिप्पली- कं सकटुत्रयं च विडङ्गमुस्ताहपुषादलानि॥३०॥दीर्घाहरिद्राक- टुरोहिणीनां दुरालभापौष्करवत्सकानाम् ॥ कुष्ठाजमोदासुरसा- दलानि चूर्ण त्वमीषां विनियोजनीयम् ॥ ३१ ॥ गुडं पुराणं द्विगुणं तथा गो-घृतेन रम्यं वटकं विदध्यात् ॥ तद्भक्षणं कामलमर्शसं च पाण्डुं ज्वरं घोरतरं निहन्ति ॥ ३२॥ तच्छो- फशोषग्रहणीविकारान्वातातिसारक्षयकासगुल्मान् ॥ ३३॥ आंवलोंका रस ६४ तोले और ईखका रस ६४ तोले, कोहलाका रस ६४ तोले, आकका रस ६४ तोले ॥ २८ ॥ इनको एक जगह मिला मंद २ अग्निसे पकावे जब चतुर्थांश बाकी रहे तब इन आगे कहीहुई औषधोंको चार २ तोले प्रमाण मिलाके फिर पकावे ॥ २९ ॥ शृंगरा, देवदार, सौंफ, धनियां, रास्ना, सूंठ, मुलहठी, इंद्रायण, पीपल, कटुत्रय अर्थात् सूंठ, मिर्च, पीपल, वायविडंग, नागरमोथा, हाऊबेर ॥ ३० ॥ दारुहलदी, कुटकी, हरीतकी, जवासा, पोहकरमूल, कूडा इनके पत्ते इन सबोंको पहले कहे हुए प्रमाणके अनुसार ले चूर्ण बना मिला देवे ॥ ३१ ॥ इस चूर्णसे दूना पुराना गुड़ मिलावे, फिर घृतमें गोली बांधलेवे
१ "सुगन्धा गन्धनाकुली" इत्यमरः। गन्धनाकुली रास्नाभेद। नाई। कन्द विशेष अथवा "इष्टगन्धः सुगन्धिः स्यादित्यमरः" । सुगन्धवर्ग-स्याहजीरा, कुंदुरु, गन्धतृण, नीलोत्पल, खश, चन्दन, गठिवन, सुखं, सहिजन, गंधक, चना, भूतृण, कचूर, रुद्रजटा, वन्ध्यककौंटिकी, खेखसा, मालती, दूर्व, वच कुलींजन, रास्ना, कृष्णाशारिवा ।