हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] भाषाटीकासमेता । ( २६१ ) मेथी और भंगरा इनको चार चार तोला प्रमाण लेवे ॥ १९ ॥ और इस चूर्णसे दूना २ भाग कज्जलके समान बारीक लोहेका चूर्ण मिलावे इस सब चूर्णसे आठ ८ भाग गोमूत्रमें इस चूर्णको पकावे फिर पकाया हुआ यह चूर्ण बलको देनेवाला है ॥ २० ॥ पांडुरोगमें बलके अनुसार सेवन किया हुआ यह चूर्ण उत्तम है और कफरोग, कामला, क्रिमिरोग, पांडु, कुष्ठ, गुदाके रोग, हलीमक इनको नाशता है ॥ २१ ॥ अथ वज्रमंडूकवटक । पुनर्नवाव्योषत्रिवृत्सुराह्वयं निशाद्वयं चव्यफलत्रयं तथा॥ घनां यवां तिक्तकरोहिणीं समां द्विभागिकं लोहरजो विमिश्रयेत् ॥ २२ ॥ गवां पयो वा द्विगुणं वियोज्यं दार्ध्या प्रलेपं प्रणि- धाय धीमान्॥ छायाविशुष्का गुटिका विधेया क्षौद्रेण मूत्रेण गवां च भक्षयेत् ॥२३॥ ज्ञात्वा बलं रोगबलं नरस्य पाण्ड्वा- मये कामलसर्वमेहे ॥ गुल्मोदराजीर्णविषूचिकानां शोफाति- सारग्रहणीविबन्धान् ॥ शूलक्रिमीनर्शविकारहेतोर्वज्रोऽय- मस्तीति विचिन्तनीयम् ॥ २४ ॥ सांठी, सूंठ, मिर्च, पीपल, निशोथ, देवदार, हल्दी, चव्य, त्रिफला, नागरमोथा, इन्द्रजव, कुटकी,हरीतकी इनको समान भाग ले और दो भाग लोहेका चूर्ण मिला॥२२॥फिर इस सब चूर्णसे दूने गौके दूधमें इस चूर्णको पकावे जब चलानेकी कडछीमें चपकने लग जावे तब उतार छायामें सुखा गोली बना लेवे फिर शहदके संग अथवा गोमूत्रके संग भक्षण करे ॥ २३ ॥ मनुष्यके बलको और रोगके बलको जानके पांडुरोगमें, कामलामें, सम्पूर्ण प्रमेहरोगोंमें इसको भक्षण करे और गुल्मोदर, अजीर्ण, विषूचिका, शोजा, अतीसार, ग्रहणी, मलका बन्ध, शूल, क्रिमी रोग और बवासीरके विकारके लिये यह वज्र है इसमें चिन्ता न करनी चाहिये ॥ २४ ॥ अथ दूसरा वज्रमंडूकवटक । पञ्चकोलकटुत्रिकं घना देवदारुकृमिशत्रुकोल कम्॥एष भाग- सहितो वियोजितो मिश्रयेत्तदनु चायसं रजः ॥ २५ ॥ तत्र चाष्टगुणमूत्रमध्यतः पाचयेद्भवति येनलेपिका॥कारयेद्दरमा- त्रया पुनश्छाययापि पिषितञ्च शोषणम् ॥ २६ ॥ कारयेत्सु- रभिमंथितॆन च पानकञ्च शमयेत्सकामलम् ॥ पाण्डुमर्शम- तिसारमन्दभुक शोषमेहगुदजान् क्रिमीन्पि ॥ २७ ॥