हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऔर रससे शरीर पुष्ट नहीं होता है ॥१२॥ खारा, कसैला, मीठा इनका पान करनेसे मनुष्यके भक्षण की हुई मृत्तिका शीघ्र ही कुपित हो जाती है, मधुर पदार्थ सेवनसे वह मृत्तिका कफको कोप करती है इसवास्ते भक्षण की हुई मृत्तिका हितको करनेवाली नहीं है ॥ १३ ॥ वात आदिक दोष विकारको प्राप्त हुए कांति, बल, जीवनेकी आशा इनको शीघ्र ही नाश देते हैं और मट्टी खानेसे हुआ पांडुरोग जठराग्निका नाश करता है ॥ १४ ॥ अथ लोहचूर्णवटी । गोमूत्रे लोहं मतिमान्स्थापयेत्सप्तरात्रकम् ॥ तस्माच्चूर्णं तु मधुना देयं पाण्ड्वामयापहम् ॥ १५ ॥ बुद्धिमान् वैद्य लोहाको सात दिनतक गोमूत्रमें स्थापित करावे फिर उसका चूर्ण बना शह- दके संग देनेसे पांडुरोगका नाश होता है ॥ १५ ॥ शुंठादिमिश्रितलोहचूर्ण । त्र्यूषणं त्रिफला मुस्ता विडङ्गं चित्रकं समम् ॥ १६॥ भागमेकं लोहचूर्णं रसेनेक्षोर्विभावयेत्॥सप्ताहं खल्वितं लौहमलमस्मिन्पु- नर्वरम्॥१७॥शीलितं तु मधुना घृतेन वा पाण्डुरोगहृदयामया- पहम्॥अर्शसामपहरं हलीमकं कामलां च किल नाशयत्यहो १८॥ सूंठ, मिर्च, पीपल, त्रिफला, नागरमोथा, वायविडंग, चीता इनको समान भाग ले ॥ १६ ॥ एकभाग लोहाका चूर्ण इनको ईखके रसमें भावना देवे अथवा इसमें लोहेके मैलको सात दिनतक खरल कर मिलावे तो अतिश्रेष्ठ है ॥ १७ ॥ इस चूर्णको शहदमें अथवा घृतमें मिला खानेसे पांडुरोग, हृदयरोग, कामला, बवासीर, हलीमक रोगोंका नाश होता है ॥ १८ ॥ अथ मंडूकवटी । त्र्यूषणं चत्रिफलं सचित्रकं मेघचव्यसुरदारुमाक्षिकम् ॥ ग्रन्थिकं च शिखिभृङ्गराजकं योजयेत्पलिकभागिकानिमान् ॥ १९॥ चूर्णिताद्विगुणमेव योजयेल्लोहचूर्णमपि कज्जलप्रभम् ॥ अष्टभागसममूत्रकल्पितं पाचितं पुनरहो बलप्रदम् ॥ २० ॥ सेवयेद्गलमुपक्रमं तथा तत्र संयुतमिहास्ति शोभनम्॥नाशयेच्च कफकामलान्कृमीन्पाण्डुकुष्ठगुदजान्हलीमकम् ॥ २१ ॥ सूंठ, मिर्च, पीपल, त्रिफला, चीता, नागरमोथा, चव्य, देवदारु, सोनामाखी, पीपलामूल,