भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । (२५९) आमपना और शरीरका पीलापन, शोष, कड़ुआ मुख रहना, मंदज्वर, तृषा, मोह, शोफ, पीलीछवि रहे ये लक्षण हों वह पित्तसे उपजा पांडुरोग जानना ॥ ८ ॥ अथ कफपांडुका लक्षण । तन्द्रालुशोफं कफकासयुक्तमालस्यप्रस्वेदगुरुत्वमेवम् ॥ संजायते तस्य कफात्मकोऽसौ नरस्य पाण्डुत्वभवो विकारः ॥९॥ तंद्रा हो, कफ, खांसी, शोजा ये हों, आलस्य हो, पसीना हो, भारीपन हो उस मनुष्यके कफसे उपजा पांडुरोग जानना ॥ ९ ॥ अथ त्रिदोषजपांडुका लक्षण । तन्द्रालस्यं श्वयथुवमथू कासहृल्लासशोषा विष्ठाभेदः परुष- नयने सज्ज्वरो वै क्षुधार्त्तः॥मोहस्तृष्णाक्लममथ नरस्याशु पश्ये- त्सुदूरं त्याज्यो वैद्यैर्निपुणमतिभिः सन्निपातोत्थपाण्डुः ॥१०॥ तंद्रा, आलस्य, शोजा, वमन, खांसी, थुकथुकी, शोष और मल पतला हो, कठोर नेत्र हों, ज्वर हो, क्षुधाकी पीडा हो, मोह हो, तृषा हो, ग्लानि हो, जिस मनुष्यके ये लक्षण हों वह सन्निपातसे उपजा पांडुरोगवाला मनुष्य उत्तम बुद्धिवाले मनुष्योंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥ १० ॥ अथ मट्टी खानेसे हुआ पांडुका लक्षण । मृत्तिकाभक्षणेनाथ शृणु पुत्र गदो महान्॥पाण्डुरोगो गरिष्ठो- ऽपि भवेद्धातुक्षयङ्करः॥११॥ मृद्भक्षणाच्चैव मलं प्रकीर्य्य स्रो- तांसि पूर्य्यन्ति तु मृत्तिकाभिः॥तेनैव नासृक् परिवर्त्तयन्ति न तर्पयन्ति वपुषं रसेन॥१२॥ क्षारात्कषायान्मधुरस्य पानात्स कोपयत्याशु नरस्य मृत्सा॥श्लेष्मप्रकोपान्मधुरानकरोति मृत्सा न जग्धा हितकारिणी स्यात् ॥ १३ ॥ विकृतिमुपगतास्ते मारुताद्यास्त्रयस्तु, द्युतिबलमभिहत्वा जीवनाशां निहन्ति भवति विकलमेवं पाण्डुरोगे शरीरं हरति जठरवह्निंमृत्तिकाभ- क्षणेन ॥ १४ ॥ हे पुत्र ! मृत्तिकाके भक्षण करनेसे महान् पांडुरोग होता है उसको सुनो, यह बडा क्लिष्टरोग है और धातुओंका क्षय करनेवाला है ॥ ११ ॥ मृत्तिकाके भक्षण करनेसे मल बिखर जाता है और उस मृत्तिकासे स्रोत भर जाते हैं फिर इसी कारणसे रुधिर नहीं प्रवृत्त होता है