हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 290, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( २५८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ पांडुरोगका निदान । दीर्घाध्वन्ये पीडितो वा ज्वरेण रक्तस्रावे पीडितो वा व्रणेन ॥ चिन्तायासाद्रोधनाद्वा मनुष्यस्यायं पाण्डुर्जायते सेवते यः ॥ ॥३॥क्षारं चाम्लं कल्यमैरेयसेवा अव्यायामान्मैथुनातिश्रमेण॥ निद्रानाशेनातिनिद्रा दिवापि योगैश्चैतैर्मृत्तिकाभक्षणेन ॥ ४ ॥ पथि शिथिलशरीरे रोगसंपीडिते वा लवणकटुकषायासेवना- म्लेन मृद्भिः॥अतिसुरसमजस्रं सेवनातिक्रमेण नयतिरुधिरशोषं तेन वै पाण्डुरोगम् ॥ ५ ॥ अत्यंत मार्गके चलनेसे अथवा ज्वरसे पीडित होनेसे, रक्तस्रावसे और व्रणसे पीडित होनेसे, चिंता होनेसे और परिश्रम होनेसे, मलआदिकके रोकनेसे मनुष्यके यह पांडुरोग हो जाता है॥ ३ ॥ क्षार, अम्ल अर्थात् खट्टा पदार्थ और प्रभातमें मैरेयसंज्ञक मदिराके सेवन करनेसे, कसरत नहीं करनेसे, मैथुन करनेसे और अत्यंत परिश्रम करनेसे और निद्राके नाश होनेसे, दिनमें अत्यंत सोनेसे इन योगोंकरके और मृत्तिकाके भक्षण करनेसे ॥ ४ ॥ रोग- पीडित शिथिल शरीर होनेपर, मार्ग चलनेसे, नमक, चरचरा, कसैला, खट्टा, मृत्तिका इनके सेवनेसे और निरंतर मैथुनके सेवनेका अतिक्रम होनेसे रुधिरका शोष हो जाता है उससे पांडु- रोग उत्पन्न हो जाता है ॥ ५ ॥ अथ पांडुरोगका पूर्वरूप । तेनाक्षकूटे श्वयथुः शरीरे पाण्डुत्वमायाति च पीतमूत्रः ॥ निष्ठिवते त्वक् प्रविदीर्य्यते च संजायते तस्य पुरःसराणि ॥६॥ उस पांडुरोगसे आंखोंके कोणमें सोजा हो, शरीर पीला हो, मूत्र पीला हो थुकथुकी हो त्वचा फट जावे ये पांडुरोगके पूर्व होने लगते हैं ॥ ६ ॥ अथ वातपांडुका लक्षण । तोदः परुषत्वशिरोगुरुत्वं त्वङ् मूत्रनेत्रे च नखे च पैत्यम् ॥ वातात्मकं तं मनुजस्य विद्धि लिङ्गै रुपेतोऽनिलपाण्डुरोगः॥७॥ व्यथा हो, कठोरपना हो, शिर भारी हो, त्वचा, मूत्र, नेत्र, नख ये पीले रहें ये लक्षण हों जिसके उसके वातसे उपजा हुआ पांडुरोग जानना ॥ ७ ॥ अथ पित्तपांडुका लक्षण । आम्लत्वपीतत्वकरो हि लोके बिभर्ति शोषं कटुतास्यतां च ॥ शोफस्तृषा मन्दज्वरश्च मोहः पीतच्छविः पित्तभवो हिपाण्डुः८ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu