हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] भाषाटीकासमेता । ( २५७ ) अतिसार, तृषा, मूर्च्छा, अफारा, भारीपन, अरुचि, श्वास, खांसी, वमन, हिचकी, ये दश शूलके उपद्रव हैं ॥ ६७ ॥ उपद्रवोंसे युक्त और तृषासे संयुक्त शूलको वैद्य- जन दूरसे त्यागे और उपद्रव रहित शूलमें सिद्धिकी इच्छा करनेवाले वैद्यको चिकित्सा करनी कही है ॥ ६८ ॥ शूलमें पथ्यापथ्य । वर्जयेद्विदलं शूली तथा सघनशीतलम् ॥ पिच्छलं च दधि चैव दिवानिद्रां च वर्जयेत् ॥ ६९ ॥ शालिषष्टिकसिन्धूत्थहि- ङ्गुसौवीरकं तथा ॥ सुरा वा गुडशुण्ठी वा पाने श्रेष्ठा भिष- ग्वर ॥७०॥ शतपुष्पावास्तुकं च हितं प्रोक्तं प्रशस्यते ॥७१॥ एणतित्तिरिलावाश्च क्रौञ्चाः शशकसारसाः ॥ एषां मांसानि शस्तानि कथितानिभिषग्वर ॥ ७२ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे तृतीयस्थाने शूलचिकित्सानाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ शूलरोगवाला पुरुष दालको वर्ज देवे और घना, शीतल और झागोंवाला ऐसा दहीत्याग देवे और दिनमें सोना वर्ज देवे ॥ ६९ ॥ शालीसंजक चावल, सांठी चावल, सैंधानमक, हींग, कांजी इनका सेवना हित है और मदिरा अथवा गुड़, सोंठ इनका पान करना वैद्यजनोंने हित कहा है ॥७०॥ सौंफ और बथुवेका शाक शूलरोगमें हित कहे हैं ॥ ७१ ॥ मृग, तीतर, लावापक्षी, कूंजीपक्षी, चौगड़ा, सारसपक्षी इनका मांस श्रेष्ठ कहा है ॥७२॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहाय- सूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने शूलचिकित्सानाम सप्तमो- ऽध्यायः ॥ ७ ॥ अष्टमोऽध्यायः ८. अथ पांडुरोगचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि पांडुरोगं महागदम् ॥ पञ्चैव पाण्डुरोगास्ते सम्भवन्तीह मानुषे ॥ १॥वातिकः पैत्ति- कश्चैव श्लैष्मिकः सान्निपातिकः ॥ पञ्चमो रूक्षणः प्रोक्तो वक्ष्ये चैषां तु सम्भवम् ॥ २ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे पुत्र ! सुनो पांडुरोगकी चिकित्साको कहते हैं, मनुष्यके पांच प्रकारके पांडुरोग होते हैं ॥ १ ॥ वातसे उपजा १, पित्तसे उपजा २, कफसे उपजा ३, सन्नि- पातसे उपजा ४, रूक्षणसंज्ञक ५ पांचवा ऐसे ५ हैं इनके उत्पत्तिको कहते हैं ॥ २ ॥ १७ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu