हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 288, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( २५६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ यवान्यादिचूर्ण । यवानीहिङ्गुसिन्धूत्थं क्षारं सौवर्चलाभया ॥ सुरामाण्डेन पातव्या परिणामे त्रिदोषजे ॥ ६३ ॥ अजवायन, हींग, सधानमक, जवाखार, कालानमक, हरड़े, इनको मदिराके संग पीनेसे त्रिदोषसे उपजा परिणामशूल शांत होता है ॥ ६३ ॥ अथ हिंग्वादिगुटी । हिङ्ग्व्योषवचाजमोदहपुषा पथ्या यवानी शटी जाजीपिप्पलि- मूलदाडिमवृकीचव्याग्निकं तिन्तिडी। तस्माच्चाम्लसुवर्चलोऽपि च यवक्षारं तथा सर्जिका सिन्धूत्थं विडचूर्णकं समकृतं स्याद्वी- जपूरे रसे ॥६४॥ कुर्याच्चूर्णगुटीं समक्षफलदाम क्षप्रमाणा- मिमां कल्को वातविकारिणां प्रददतः शूलार्शसप्लीहकान् ॥ कासानाहविबन्धमेहहृदयशूलं निहन्त्याशु वै कर्त्तव्यं किल संशयं न भिषजां वृन्दैः सदा धार्यते ॥६५॥ एष हिंग्वादिको नाम सर्वशूलार्त्तिनाशनः ॥ सर्ववातविकारघ्नः सर्वक्षय- निवारणः ॥ ६६ ॥ हींग, सूंठ मिर्च, पीपल, वच, अजमोद, हाउबेर हरड़े, अजवायन, कचूर, जीरा, पीपला मूल, अनारदाना, कश्मीरीपाठा, चव्य, चीता, आमलकी, निंबू, जवाखार, कालानमक, साजी, सेंधानमक, मणियारीनमक इनको समान भाग ले चूर्ण बना बिजौराके रसमें ॥६४॥ इसचूर्णकी तोला प्रमाण गोली बनावे अथवा इन्होंका कल्क वना देनेसे वातके विकार, शूल, बवासीर, तिल्ली, खाँसी, अफारा, मलका बंधा, प्रमेह और हृदयशूल शीघ्र ही नाशता है इसमें संशय न करे श्रेष्ठ वैद्य इसे धारण करते हैं॥६५॥ यह हिंगुआदिकनामवाला औषध सम्पूर्ण शूलकी पीड़ाओंको नाश करता है और सब प्रकारके वातविकारोंको नाशता है, सब प्रकारके क्षयरोगोंको निवारण करता है ॥ ६६ ॥ अथ शूलरोगके उपद्रव । अतीसारतृषा मूर्च्छा अनाहो गौरवोऽरुचिः ॥ श्वासकासौ वमिर्हिक्का शूलस्योपद्रवा दश ॥ ६७ ॥ शूलं सोपद्रवं तृष्णां भिषग्दूरे परित्यजेत् ॥ अनुपद्रवे क्रिया प्रोक्ता भिषजां सिद्धि- मिच्छता ॥ ६८ ॥