हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 287, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ७] भाषाटीकासमेता । (२५५) “पलाशादिघृत” टेसू, केला, वांसा, लटजीरा, तालमखाना, हींग, सोंठ, इनको गोमूत्रमें पक्व क्वाथ बना देनेसे ॥ ५६ ॥ त्रिदोषसे उपजा शूल, कामला, मलका बंधा, गुल्मरोग, उदररोग, मन्दाग्नि दूर होता है ॥ ५७ ॥ अथ सर्वशूलपर उपाय । एक एव कुबेराक्षः सर्वशूलापहारकः ॥ किं पुनः स त्रिभिर्युक्तः पथ्यारुचकरामठैः ॥ ५८ ॥ अकेली पाढ़रि ही सर्वशूलोंको दूर करती है, फिर उसके साथ हरड़े, सोंचर और हींग होवे तो क्या कहना अर्थात् अवश्यही शूलको दूर करती है ॥ ५८ ॥ अथ शङ्खक्षार । शङ्खक्षारं च लवणं हिङ्गुव्योषसमन्वितम् ॥ उष्णोदकेन तत्पीतं हन्ति शूलं त्रिदोषजम् ॥ ५९ ॥ शंखका खार, नमक, हींग, व्योष, (सुंठ, मिर्च, पीपल,) इनका चूर्ण गरमजलके संग पीनेसे त्रिदोषसे उपजा शूल नाश होता है ॥ ५९ ॥ अथ सामान्यसे सब शूलोंकी चिकित्सा । लङ्घनं वमनं चैव विरेकश्चानुवासनम् ॥ निरूहो बस्तिकर्माणि परिणामे त्रिदोषजे ॥ ६० ॥ त्रिदोषसे उपजे परिणामशूलमें लंघन, वमन, जुलाब, अनुवासनवस्ति, इन कर्मोंको करवावै ॥ ६० ॥ अथ चित्रकादिमोदक । चित्रकं त्रिवृता दन्ती विडङ्गं कटुकत्रयम् ॥ समं चूर्ण गुडेनाथ कारयेन्मोदकान्सुधीः ॥६१॥ भक्षयेत्प्रातरुत्थाय पश्चादुष्णो- दकं पिबेत्॥ परिणामोद्भवं शूलं हन्ति शूलं नरस्य च ॥ ६२ ॥ चीता, निशोत, जमालघोटेकी जड, वायविडंग, सोंठ, मिर्च, पीपल इनको समान भाग ले चूर्ण बना फिर वैद्यजन उसको गुड़में गोली बांधलेवे ॥ ६१ ॥ प्रातःकाल उठके इसका भक्षण करे और ऊपरसे गरमजल पीवे । यह परिणामशूलको नाशता है ॥ ६२ ॥ १ कृष्णवृन्ता कुबेराक्षीत्यमरः । कृष्णवृन्ता कुबेराक्षी सप्तगठलायाः “पाडली” इति ख्याताया इत्यमरविवेके । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu