भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 286

( २५४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ वातपित्तशूलचिकित्सा । पटोलारिष्टपत्राणि त्रिफलासंयुतानि च ॥ क्वाथं मधुयुतं पानं शूले पैत्ते समीरणे ॥ ५१ ॥ पित्तज्वरतृषादाहरक्तपित्तनि- वारणम् ॥ ५२ ॥ ( पटोलादि क्वाथ ) परवल, नींव इनके पत्ते, त्रिफला इनका क्वाथ बना तिसमें शहद- मिला पान कराना वातपित्तशूलको शांत करता है ॥ ५१ ॥ पित्तज्वर, तृषा, दाह और रक्तपित्त इनको निवारण करता है ॥ ५२ ॥ अथ दुरालभादिकल्क । दुरालभा पर्पटकं च विश्वा पटोलनिम्बाम्बुदतिन्तिडीकम् ॥ सशर्करं कल्कमिदं प्रयोज्यं सपित्तवातोद्भवशूलशान्त्यै॥५३॥ जवासा, पित्तपापड़ा, सोंठ, परवल, नींव, नागरमोथा, अमली इनका कल्क बना खांड मिला देनेसे पित्तवातसे उपजा शूल शांत होता है ॥ ५३ ॥ अथ वातकफशूलचिकित्सा । सौवर्चलं समशटी सहनागरा च शुण्ठीयुतेन कथितेन जलेन चूर्णम्॥पीतं निहन्ति मरुतायुतश्लैष्मिकाणां पार्श्वार्तिशूलज- ठरानलहृत्प्रशस्तम् ॥ ५४ ॥ “सौवर्चलादि चूर्ण” कालानमक, कचूर, नागरमोथा, सोंठ इनका चूर्ण बना औटाया हुआ जलके संग लेनेसे वात कफसे उपजाहुआ शूल शांत होता है और पसली, शूल, मन्दाग्नि इन रोगोंके हरनेमें श्रेष्ठ कहा है ॥ ५४ ॥ अथ दार्वादि क्वाथ । दारु नागरकं वासा हिङ्गु सौवर्चलान्वितम् ॥ क्वाथो वातकफे शूले आमेऽजीर्णे विबन्धके ॥ ५५ ॥ देवदार, सोंठ, वांसा, हींग, कालानमक, इनका क्वाथ वातकफसे उपजे शूल, आमरोग, अजीर्ण और मलके बन्धमें देना श्रेष्ठ है ॥ ५५ ॥ अथ त्रिदोषशूल चिकित्सा । पलाशकदलीवासापामार्गकोकिलाह्वयम्॥ गोमूत्रेण शृतं तच्च हिङ्गुनागरसंयुक्तम् ॥५६॥ हितं त्रिदोषजे शूले कामलाविड्वि- बन्धके ॥ गुल्मोदराणां शमनं मंदाग्नीनां नियच्छति ॥ ५७ ॥