भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( २६७ ) अथ धातु--रस-आदि सात ७ प्रकारकें क्षयरोगकें लक्षण ! अथ धातुक्षयं वक्ष्ये हारीत शृणु साम्प्रतम् ॥ रसरक्तमेदमांसानां प्रत्येकं क्षयलक्षणम् ॥ १७ ॥ हे हारीत ! अब धातुके क्षयरोगको कहते हैं सुन । रस, रक्त, मांस,मेद, इन सबोंके एक २ के लक्षणको कहते हैं ॥ १७ ॥ अथ रसक्षयका लक्षण ! रसक्षयेऽतिशोषश्च मन्दाग्नित्वं च वेपथुः॥ शिरोरुङ्मन्दचेष्टत्वं जायते च क्लमभ्रमौ ॥ १८ ॥ रक्तक्षये क्षयः पाण्डुर्मन्दचेष्टो भवेन्नरः ॥श्वासो निष्ठीवनं शोषो मन्दाग्नित्वं च जायते॥१९॥ रसके क्षय होनेमें अत्यंत शोष हो, मंद अग्नि हो, कंपना हो,शिरमें पीडा हो,मंदचेष्टा हो, ग्लानि हो, भ्रम हो ॥ १८ ॥ रक्तक्षय होनेमें क्षयरोग होवे तो पांडुरोग हो जावे, मंद- चेष्टा हो जावे, श्वास हो, थुकथुकी हो, शोष हो, मंदाग्नि हो ॥ १९ ॥ मांसक्षयका लक्षण । मांसक्षयेऽतिकृशता चेष्टनं चाङ्गभङ्गता ॥ निद्रानाशोऽतिनिद्रास्य विसंज्ञो लघुविक्रमः ॥ २० ॥ मासके क्षय होनेमें दुबलापन हो,देह चमकने लगे,देहमें दर्द हो,निद्राका नाश हो अथवा इसको अत्यंत निद्रा आवे और संज्ञा नहीं रहे, अल्पबल रहे ॥ २० ॥ अथ मेदःक्षयका लक्षण । मेदःक्षये मन्दबलो विसंज्ञता पारुष्यमङ्गस्य च भङ्गता स्यात्॥ श्वासातिकामारुचिताग्निमान्द्यंगतिर्विशोषश्च तथैव जायते२१ मेदके क्षय होनेमें मंदबल रहे, संज्ञा नहीं रहे, अंगभंग हो, कठोरता रहे और श्वास, अत्यन्त खांसी, अरुचि, मन्दाग्नि,गमन और शरीरमें शोष हो ये उपद्रव होते हैं ॥२१॥ अथ अस्थिक्षयका लक्षण । अस्थिक्षये स्यादतिमन्दचेष्टा वीर्यस्य मान्द्यं किल मेदसः क्षयः॥विसंज्ञता कम्पनता च कार्श्यता तथाङ्गभंगो वमनं कठोरता ॥२२॥दोषस्य शैथिल्यमथापि शोषिता विकम्पन शोषरुजश्च जायते ॥ लिङ्गैरथैभिः परिवेद्मज्जाक्षयोऽधिका कम्पनतैव चात्र ॥ २३ ॥