हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २७६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- च वस्तावपि योजयेत्तद्दिनाशमेत्याशु च राजयक्ष्मा ॥ हली- मकः कामलपांडुरोगो मूर्च्छा भ्रमः कम्पशिरोऽर्त्तिशूलम्॥८०॥ महाश्मरी वा गुदकीलकुष्ठं शिरोगतो नाशमुपैति रोगः॥तस्य प्रदानेन वियोजितेन पानेन पाण्ड्वामयराजयक्ष्मा ॥८१॥ नाशं शमं याति हलीमको वा बस्तिप्रदानेन गुदोद्भवाश्च॥रोगो विनाशं समुपैति पुंसां विसर्पविस्फोटकमोक्षणेन ॥ ८२ ॥ गिलोय, कूडाकी छाल, मुलहटी, पोहकरमूल, गोखरू, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली, नीला कमल, भूमिआंवला, जवासा, त्रायमाण, पीपली, कूट ॥ ७८ ॥ दाख, इनको समान भाग ले फिर आंवलोंका रस ६४ तोले, बकरीका दूध १२८ तोले, दही ६४ तोले, घृत ६४ तोले इनमें मिला अग्निसे पकावे । यह घृत पानमें और भोजनमें हित कहा है ॥ ७९ ॥ नस्यमें तथा वस्तिकर्ममें भी युक्त करना हित कहा है और राजयक्ष्मा, हलीमक, कामला, पांडुरोग, मूर्च्छा, भ्रम, कंपरोग, शिरकी पीड़ा, शूल इन रोगोंको नाशता है ॥ ८० ॥ महापथरी, गुदकील, कुष्ट, शिरका रोग इनका नाश होता है और इस घृतका पान करनेसे पांडुरोग, राजयक्ष्मा ॥ ८१ ॥ हलीमक, इन रोगोंका नाश होता है और इस घृतको वस्तिकर्ममें वर्त्तनेसे गुदाके रोग दूर होते हैं और इस घृतके मोक्षण अर्थात् शरीरपै छिड़कनेसे विसर्प,विस्फोटक इन रोगोंका नाश होता है ॥ ८२ ॥ अथ पिप्पली आदि घृत । कणा पयःपञ्चगुणे पलाश आद्यं घृतं वै विपचेत्समांशम् ॥ पानेऽथवा भोजनके प्रशस्तं देयं च राजक्षयनाशहेतोः ॥८३ ॥ पीपली, केशू, इनको समान भाग ले इनसे पांचगुना दूधमें इन औषधोंके समानभाग, गौके घृतको और इन औषधोंको पकावे । यह घृत पानमें और भोजनमें श्रेष्ठ है और राजयक्ष्मा,क्षय- रोग इनका नाश करता है ॥ ८३ ॥ अथ पञ्चकोलआदि घृत । पञ्चकोलं यवाग्रञ्च क्षीरं दध्ना घृतं पुनः॥समांशेन तु योज्यानि भार्गी कुष्ठं तु पौष्करम् ॥८४॥ शतं तत्र हरीतक्या जले चैव चतुर्गुणे ॥ क्वाथं चैकत्रयं योज्यं क्वाथयेन्मृदुवह्निना ॥ ८५ ॥ मृदुपाकं घृतं सिद्धं पाने नस्ये च बस्तिषु ॥ गुणाधिक्यं भवे-