भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 310

( २७८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- सर्पिःप्रयुक्तं नवनीतकं च सर्पिस्तदर्द्धेन नियोजनीयम् ॥ सिद्धं घृतं पानमथैव बस्तौ नस्ये तथाभ्यञ्जनभोजनेन॥९५॥जवन्य- कासक्षयकामलानां राजक्षये क्षीणबलेन्द्रियाणाम् ॥ शतेषु शोषेषु व्रणेषु शस्तं शिरोऽर्त्तिपाश्र्वार्त्तिगुदामयघ्नम् ॥ ९६ ॥ खरैहटी, बडा गोखरू, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली, माषपर्णी, मूंगपर्णी, छोटा गोस्वरू और बड़ा गोखरू, शालपर्णी, परवल, नींवके पत्ते, नागरमोथा, त्रायमाण, जवासा ॥ ९३ ॥ इनका काथ बना जब चतुर्थांश बाकी रहे तब उतार वस्त्रसे छान पीछे दाख, कचूर, पोहकर- मूल, आंवला, भूमिआंवला, इनका चूर्ण मिलावे और इस काथके समान दूध मिला ॥ ९४ ॥ नूनीघृतसे आधा और घृत मिला पीछे इस घृतको उस काथमें पकावे फिर यह घृत पीनेमें, वस्तिकर्ममें, नस्यमें, मालिसमें, भोजनमें बर्त्तना श्रेष्ठ कहा है ॥ ९५ ॥ अत्यंत खांसी, क्षय- रोग, कामला, राजयक्ष्मा इन रोगोंको नाशता है और क्षीण इंद्रियोंवाले तथा क्षीण बलवाले पुरुषोंको हित कहा है। क्षतरोग, शोजा, व्रण, शिरकी पीडा, पसलीकी पीडा, गुदाका रोग इनको नाश करता है ॥ ९६ ॥ अथ चन्दनादि तैल । चन्दनं सरलं दारु यष्ट्येला वालकं शटी।। नलशैलेयकं पृक्का पद्मकं वनकेसरम् ॥९७॥ कङ्कोलंकं मुरामांसी शैरियं द्वहरी- तकी॥रेणुकात्वक्कुङ्कुमंच सारिवे द्वे तिक्तागरुः ॥९८॥ नलि- काबले तथा द्राक्षा कषायं सुपरिस्रुतम्॥तैलमस्तु तथा लाजा रसेन समभागिकम् ॥९९॥ मन्दाग्निना पचेत्तैलं सिद्धं पाने च बस्तिषु॥ नस्ये चाभ्यञ्जने चैव योजयेत्तद्भिषग्वरः ॥ १०० ॥ हन्ति पाण्डुक्षयं कासं ग्रहगं बलवर्णकृत्॥मन्दज्वरमपस्मारकुष्ठ- पामाहरं पुनः ॥ १०१ ॥ करोति बलपुष्ट्योजो मेधाप्रज्ञायुर्व- र्द्धनम् ॥रूपसौभाग्यदं प्रोक्तं सर्वभूतयशस्करम् ॥१०२॥ चन्दन, सरल, देवदार, मूलहटी, इलायची, नेत्रवाला, कचूर, नल, शिलारस, पृक्कासंज्ञक वृक्ष, पद्माक, वनकेशर, ॥ ९७ ॥ कंकोल, मुरामांसी, लोबान, दोनों प्रकारकी हरडें, रेणुका, दालचीनी, केशर, दोनों प्रकारकी सारिवा, अनंतमूल, कुटकी, अगर ॥ ९८ ॥ नाड़ीशाक, खरैहटी, दाख इनका काथ बनावे और पीछे उस काथमें तेल, दहीका पानी, धानकी खीलोंका, रस इनको समान भाग ले मिलावे ॥९९॥ इस तेलको मन्द मन्द अग्निसे पकावे सिद्ध किया