भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 311, कुल 548 में से

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अ० ९] भाषाटीकासमेता। (२७९) हुआ यह तैल वैद्यजनोंको पीनेमें, वस्तिकर्ममें, नस्यमें तथा मालिसमें बर्ताना चाहिये॥१००॥ यह तैल पांडुरोग, क्षयरोग, खांसी, ग्रहदोष इनको नाशता है और बल वर्ण इनको करता है, मन्द- ज्वर, अपस्मार, कुष्ठ, पामा इन रोगोंको नाशता है ॥ १०१ ॥ बल, पुष्टि, पराक्रम, मेधा, बुद्धि, वायु इनको बढ़ाता है, रूप सौभाग्य इनको करता है, सम्पूर्ण भूतपीडाको दूर करता है १०२. अथ राजयक्ष्मारोगका निदान । स्वामिभार्याभिगमने गुरुपत्न्यभिलाषणात्॥ राजस्वहेमचौ- र्याद्वा राजयक्ष्मा भवेद्गदः ॥१०३॥ अथवा दुष्टरोगेण जायते शृणु पुत्रक॥चतुर्भिर्हेतुभिर्यक्ष्मा जायते शृणु साम्प्रतम् १०४॥ व्यायामयानसुरतागतिपीडिताङ्गरोगेण वा व्रणनिपीडितक्षीण- देहात् ॥ क्रोधातिशोकभयलङ्घनतोऽनभक्षात् सञ्जायते च मनुजस्य महागदोऽयम् ॥ १०५ ॥ वार्द्धक्याद्यो भवति नितरां ज्याधनुःकर्षणेन भारात्यर्थं भवति हननोत्पातबन्धेन युद्धात्॥ दूराध्मानात्कदशनवशाच्चिन्तयातिव्यवायात्सम्भूतिः स्यान्मनुजबृहद्राजयक्ष्मेतिसंज्ञः ॥ १०६ ॥ स्वामीकी स्त्रीसे संग करनेसे और गुरुकी स्त्रीसे अभिलाषा करनेसे, राजाका द्रव्य और सुवर्ण- की चोरी करनेसे राजयक्ष्मा रोग होता है ॥ १०३ ॥ अथवा दुष्टरोगसे होता है सो हे पुत्र ! चार हेतुओंकरके यह राजयक्ष्मा रोग होता है सो सुन ॥ १०४ ॥ कसरत, असवारी, मैथुन, गमन इनसे पीड़ित अंग होनेसे, रोगसे, व्रणसे पीडित होनेसे, क्षीण देह होनेसे, क्रोध, अतिशोक, लंघन करना, भय, व्रत इनसे मनुष्यके यह महान् रोग होता है ॥ १०५ ॥ निरन्तर धनुष्यके खींचनेसे बुढ़ापा हो जाता है उससे और अत्यन्त भार उठानेसे चोर आदिके उत्पातसे, युद्धसे, दूरसे अग्निको धमानेसे, बुरा भोजन करनेसे, चिंता करनेसे, अति मैथुनसे, मनुष्यके बलको हरनेवाला राजयक्ष्मासंज्ञक रोग हो जाता है ॥ १०६ ॥ अथ राजयक्ष्माके लक्षण । क्षतक्षयाच्छूष्माद्वापि सहसोपप्लवादपि॥व्यवायातिप्रसङ्गेन तथा रूक्षातिसेवनात्॥१०७॥तेन संक्षीयते गात्रं ज्वरो मन्दश्च जा- यते॥ज्वरान्ते जायते शोफो मलविद् चातिमूत्रता १०८॥अति- सारश्च भवति भक्षणेनातिशेषते॥ कासते ष्ठीवतेऽत्यर्थं शोषं च Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

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