हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- कुरुते भृशम् ॥ १०९॥ स्त्रियोऽभिलाषतात्यर्थं वार्त्तायाद्विषता पुनः ॥ राजयक्ष्मेति विज्ञेयो गदः साध्यो न विद्यते ॥ ११०॥ सुप्तौ पादौ भवेतां तु ग्रासं च बहु मन्यते॥शब्दे च पडुता यस्य राजयक्ष्मा न जीर्य्यति ॥ १११ ॥ उरःक्षतसे, क्षय होनेसे अथवा श्रमसे एक बार जोरसे कूदनेसे, अत्यंत स्त्रीसंग करनेसे, रूखा भोजन सेवनेसे॥ १०७॥शरीर क्षीण हो जाता है और मन्दज्वर हो जाता है, ज्वरके अंतमें शोजा होजाता है, मैल और विष्ठा मूत्र अत्यन्त उतरता है॥१०८॥अतिसार होता है, भोजन किया हुआ जरता नहीं है, अत्यन्त खांसता है और अत्यन्त थूकता है, बहुतसा शोष हो जाता है॥१०९॥ स्त्रीकी अभिलाषा अत्यन्त रहती है और वार्ता नहीं सुनी जाती है ऐसा यह राजयक्ष्मा रोग कहाता है, यह साध्य नहीं कहा है ॥११०॥ जिसके पैर शून्य हो जावे और एक ग्रास भोजन- को भी बहुत माने और जिसकी बोली नम्रहो ऐसे पुरुषका राजयक्ष्मा रोग शांत नहीं होता है१११ अथ राजयक्ष्माका इलाज । यदन्नं यत्समाहारं यादृशं प्रतियाचते ॥ तत्तस्य च प्रदातव्यं मधुरं घनमेव च ॥११२॥ यद्यदाहारमिच्छेद्रा नरं वा राजय- क्ष्मिणम्॥तस्य तस्यास्य लाभेन क्षीयन्ते नास्य धातवः११३॥ यदा सरक्ताः शोफाः स्युः पाकतां यांति मानवे॥तदा पुनर्नवा- क्वाथः सलेशः प्रविधीयते ॥ ११४ ॥ जो अन्न अथवा जो पदार्थ राजयक्ष्मारोगवालेको देवे वही उसको मधुर और कड़ा देना चाहिये ॥११२॥ राजयक्ष्मारोगवालेको जिस जिस भोजनकी इच्छा होती है उसी उसी भोजनसे इसकी धातु क्षीण नहीं होती है॥११३॥जो यदि राजयक्ष्मारोगवाले पुरुषके रक्तसहित शोजा होवे और पक जावे तो सांठीका क्वाथ किंचित्मात्र देना चाहिये ॥ ११४ ॥ अथ राजयक्ष्मावालेंकी आयुष्यमर्यादा । सजीवेच्चतुरो मासान्षण्मासं वा बलाधिकः॥उत्कृष्टैश्च प्रतीकारैः सहस्राहं तु जीवति ॥ ११५ ॥ सहस्रात्परतो नास्ति जीवितं राजयक्ष्मिणः ॥ गतप्राणौजोषीर्य्यश्च क्षीणश्च विकलेन्द्रियः ॥११६॥ न भवेत्पुनरुच्छ्रायो याप्यरोगश्च मुञ्चति॥ यस्तदाया- ससम्पन्नो भूयोऽपि कासना भवेत् ॥११७॥तस्य प्राणापहारी