हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने. अथ तालकाभ्रातक। तालकं च शिलाभेदस्तथा चैव शिलाजतुः॥क्षीरके द्वे समङ्गा च कुष्ठ नागबला बला ॥ १२४ ॥ एलापत्रकतालीसं तमालं हरिचन्दनम्॥ मुस्ता द्राक्षा च रास्ना च मुण्डी शैलेयकं पुरः ॥१२५॥सुरसा चैव संयोज्या तिलाः कृष्णा द्विभागिकाः ॥ चूर्णं सूक्ष्मं प्रयुञ्जीत गुडेन मधुना युतम् ॥ १२६ ॥ पश्चाद्गो- क्षीरपानं स्यात्क्षीरेण सह भोजनम् ॥राजयक्ष्मादिभिः क्षीणा. ग्रहणीपीडिताश्च ये ॥१२७॥ धातुक्षीणबला ये च तेषां संयो- जयेद्भृशम्॥वृद्धोऽपि तरुणो भूत्वा नरो नार्य्यामिनन्दति १२८॥ वन्ध्यापि लभते पुत्रं षण्ढोऽपि पुरुषायते ॥ तालकाभ्रातकं नाम कृष्णात्रेयविभाषितम् ॥ १२९ ॥ शुद्ध और मारित हरताल, पाषाणभेद, शिलाजीत, काकोली, क्षीरकाकोली, मंजीठ, कूठ, बडीखरैंहटी, खरैंहटी ॥ १२४ ॥ इलायची, तेजपात, तालीसपत्र, तमालपत्र, लालचंदन, नागरमोथा, दाख, रास्ना, गोरखमुंडी, लोवान, गूगल ॥ १२५ ॥ तुलसी और कालेतिल दो भाग, इनका सूक्ष्म चूर्ण बना तिसमें गुड़ और शहद मिला भक्षण करे ॥ १२६ ॥ और पीछे गौके दूधको पीवे और दूधके सगही भोजन करे, जो पुरुष राजयक्ष्माआदि रोगोंसे पीडित है और जो ग्रहणी रोगसे पीड़ित है ॥ १२७ ॥ धातुक्षीणरोगवाले इनको यह चूर्ण देना चाहिये और इसके खानेसे वृद्धपुरुष भी जवान होके स्त्रीके संग रमण करता है ॥१२८॥ वंध्या स्त्री पुत्रको प्राप्त होजाती है और नपुंसक भी पुरुषकी तरह आचरण करता है यह तालकाभ्रातकनामवाला औषध कृष्णात्रेयजीने कहा है ॥ १२९ ॥ अथ गुडूच्यादिचूर्ण । गुडूची च बले द्वे च धात्री च मरिचानि च ॥ चूर्ण गुडेन संयुक्तं राजयक्ष्मापहं नृणाम् ॥ १३०॥ गिलोय, दोनों प्रकारकी खरैंहटी, आंवला, मिरच, इनका चूर्ण गुड़में मिला खानेसे राजयक्ष्मारोगका नाश होता है ॥ १३० ॥ अथ क्षयरोगपर पथ्यापथ्य । शालिषष्टिकगोधूमवास्तुकं जाङ्ग्लानि च ॥ मुद्गांश्च गोपयश्चैव शशकैणकुरङ्गिणाम् ॥ १३१ ॥ तित्तिरकौञ्चलवानां वार्त्ताक-