हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपिच्छकच्छागलानां हि ॥ कथितानि मांसादीनि प्रलेपकानि जगति च ॥१३२॥विभोजयेत्क्षीरसर्पिः क्षये वा राजयक्ष्मणः॥ क्षाराम्लकटुकं तीक्ष्णं तैलं सौवीरकं सुरा ॥राजिकावर्जिताश्चैते क्षये वा राजयक्ष्मणः ॥ १३३ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने क्षयरोगचिकित्सा नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ शालीसंज्ञक तथा सांठीचावल, गेहूँ, बथुआका शाक, जांगलदेशके जीवोंका मांस, मूंग, गौका दूध और शूस़ा, काला हिरन, हिरन ॥ १३१ ॥ तीतर, कूंजि, लावा, बत्तक, मोर, वर्करा इन्होंका मांस, इन सबोंका भोजन करना श्रेष्ठ कहा है ॥ १३२ ॥ और राजयक्ष्मा रोगमें तथा क्षयरोगमें दूध और घृतका भोजन करना श्रेष्ठ कहा है और खारा, खट्टा, चर्रचरा, तीक्ष्ण ऐसा पदार्थ, तैल, कांजी, मदिरा, राई ये क्षयमें तथा राजयक्ष्मा रोगमें वर्ज देने चाहिये ॥१३३॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने- क्षयरोगचिकित्सानाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
अथ दशमोऽध्यायः १०. ❖ अथ रक्तपित्तका निदान और चिकित्सा । अतिघर्मतयावापि तीक्ष्णोष्णकटुसेवनात्॥क्षाराम्लसेवनाद्वापि मद्यपानादिसेवनात् ॥ १॥ अतिव्यवायाच्छीतेन शुष्कशाका- दिसेवनात् ॥ एतैस्तु कुपितं पित्तं रक्तेन सह मूर्च्छितम् ॥ २ ॥ पुत्रस्तु संशयापन्नः पप्रच्छ पितरं पुनः ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-अत्यंत घामसे और तीक्ष्ण तथा गरम वस्तुके सेवनेसे और खारे खट्टे पदार्थके सेवनेसे तथा मदिराके सेवनेसे ॥ १ ॥ अत्यंत मैथुनके सेवनेसे, शीतल पदार्थके सेवनेसे, सूखे शाकादिके सेवनेसे कुपित हुआ पित्त रक्तके संग मूर्च्छाको प्राप्त हो जाता है ॥२॥ ऐसे सुन संशयमें युक्त हुआ हारीत आत्रेयजीसे पूछता है ॥ ३ ॥ हारीत उवाच॥ कथं पित्तं प्रकुपितं केन वापि प्रचाल्यते ॥ तद्द्रक्तं प्रकुपितं जायते केन हेतुना ॥ ४ ॥ युगपद्दृश्यते केन कथं वापि प्रवर्त्तते ॥ एवं पृष्टो महाचार्य्यः प्रोवाच मुनिपुङ्गवः५