हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 323, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १० ] भाषाटीकासमेता । ( २९१ ) अथ शतावरीघृत । शतावरी मधुकं बला च ससिता काकोलिका दाडिमा मेदः क्षीरविदारिका च फलिनी स्यात्तिन्तिडीकं बला ॥ सिद्धा गोपयसाज्यकं हितमिदं पाने तथा बस्तिषु योनौ मेढ्रगुदप्र- वृत्तरुधिरं हन्यात्सकासक्षयम् ॥ ५१ ॥ शतावरी, मुलहटी, खरैहटी, मिसरी, ककोली, अनारदाना, मेदा, विदारीकन्द, गोंदी, अमली, खरैहटी इन औषधोंको गौके दूधमें पकावे, फिर उसमें घृत मिला उसको सिद्ध करे । यह घृत पीनेमें तथा वस्तिकर्ममें हित है और योनि, लिंग, गुदा इनमें प्रवृत्त हुए रक्तको नाशता है और खांसीको दूर करता है ॥ ५१ ॥ अथ मृद्वीकाआदिघृत । मृद्वीका मधुकं विदारिवसुधा नीलीसमङ्गाफला काकोल्यो बृहती युगं वृषमहामेदासितं चन्दनम् ॥ जातीपत्रपटोलश्याम- म्मृतासंजीवकाश्चाभया मेदे द्वे च कुचन्दनं मधुरसाः श्यामाः समांशास्त्वमी ॥ ५२ ॥ पक्त्वा गोपयसा विशुद्ध- विधिना सिद्धं चतुर्थांशकं मत्स्यण्डी मधुकं च सिद्धमिति चेत्पानं प्रशस्तं नृणाम् ॥ स्त्रीणां चापि हितं निहन्ति रुधिरं पित्ताद्गुदे वा भवेन्मेढे चापि च रोमकूपकपथे वृत्तं निहन्या- त्स्रजम् ❊ ॥ ५३ ॥ एतद्द्ाक्षाभिधानं घृतमपि विहितं रक्त- पित्ते ज्वरे वा वातास्रे योनिशूले भ्रममदशिरसोन्मादरक्तप्रमेहे॥ पित्ताम्ले चातिकुष्ठे क्षयक्षतरुधिरे राजयक्ष्मेऽथ पाण्डौ पाने बस्तौ च नस्ये हितमपि मनुजां भाषितं चात्रिणा च ॥ ५४ ॥ मुनका दाख, मुलहटी, विदारीकन्द, लघुखजूरी, नील, मजीठ, त्रिफला, काकोली, दोनों प्रकारकी कटेहली, वांसा, महामेदा, सफेद चन्दन, जावित्री, परवल, निशोथ, गिलोय, जीवक, हरडै, मेदा, महामेदा, लाल चन्दन, मूर्खा, पीपल इन सबोंको समान भाग ले ॥ ५२ ॥ फिर गौके दूधमें पकावे, फिर चतुर्थांश बाकी रहे तब उतारि राव, मुलहंटीका चूर्ण इनको मिलावे। इसका पीना मनुष्योंको तथा स्त्रियोंको भी हित है और रक्तरोगको नाशता है और पित्तसे प्राप्त हुआ गुदाका रक्त और लिंग, रोम इनमें प्राप्त हुआ रक्त इनका नाश होता है ॥ ५३ ॥ ❊ अत्र घृतं दत्त्वा साधयेदिति भावार्थः ।