हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २९२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- यह द्राक्षा आदि नामक घृत रक्तपित्तमें और ज्वरमें हित है और वातरक्त, योनिशूल, भ्रम, मद, शिरोरोग, उन्माद, रक्तप्रमेह, पित्ताम्ल, अतिकुष्ठरोग, क्षयी, क्षतरक्त, राजयक्ष्मा, पांडुरोग इन सब रोगोंको नाशता है और अत्रिऋषिसे कहा हुआ यह घृत पानमें तथा वस्तिकर्ममें मनुष्योंको हित कहा है ॥ ५४ ॥ अथ कूष्मांडवलेह । छल्लिं निष्कृष्य कूष्माण्डखण्डानि प्रतिकल्पयेत् ॥ काञ्जिके- नाशु धौतानि पुनरेव जलेन तु॥५५॥पश्चात्क्षीररसप्रस्थे कल्क- येत्पुनरेव च॥घृतेन पुनरैवैतत्पाचयेत्सुविधानतः॥५६॥यदा मधुनिभानि स्युस्तदा शर्करया सह॥निधाय तत्र चेमानि भेष- जानि प्रकल्पयेत्॥५७॥पिप्पलीशृङ्गवेराभ्यां द्वे पले मरिचानि च॥जीरके द्वे तथा धात्री त्वगेलापत्रकं तथा ॥ ५८ ॥ पला- र्द्धेन वियुञ्जीयाच्चूर्णं तत्र विनिक्षिपेत्॥दार्व्या विघट्टयेत्ताव- ल्लेहीभूतं यदा भवेत् ॥५९॥ तदा मधुघृतेनापि लिह्याज्ज्ञात्वा बलाबलम्॥रक्तपित्तं क्षयं कासं कामलं नैमिकं भ्रमम् ॥६०॥ छर्दितृष्णाज्वरश्वासपाण्डुरोगान् क्षतक्षयम् ॥ अपस्मारं शिरो- र्त्तिञ्च योनिशूलं च दारुणम्॥६१॥चिरं योनौ रक्तवाहं मन्द- ज्वरनिपीडनम्॥वृद्धोऽपि च युवा कामी वन्ध्या भवति पुत्रिणी ॥ ६२ ॥ अवीर्य्यो वीर्य्यमाप्नोति भवेत्स्त्रीणां प्रियो नरः ॥ एष कूष्मांडको लेहः सर्वरोगनिवारणः ॥ ६३ ॥ कोहलेको छील उसके टुकड़े बनाके कांजीसे धोवे पीछे जलसे धोवे ॥ ५५ ॥ फिर उसका कल्क बना ६४ तोले दूध मिला पीछे ६४ तोले घृत मिला अच्छे विधानसे पका लेवे ॥ ५६ ॥ जबवे कोहलाके टुकड़े शहदके समान वर्णवाले हो जावें तब खांड़ मिला इन आगे कही हुई औषधोंको मिलावे ॥ ५७॥ पीपल, अदरक, मिरच ये आठ आठ तोले और दोनों जीरे, आंवले, दालचीनी, इलायची, तेजपात ॥ ५८ ॥ ये दो दो तोला मिला चूर्ण बनाके गेरे फिर कडछीसे चलावे जब लेह बन जावे ॥ ५९ ॥ तब वलावलको विचार शहद और घृतके संग इसको खावे । यह अवलेह रक्तपित्त, क्षयी, खांसी, कामला, चक्करकी तरह भ्रम इन रोगोंको नाशता है ॥ ६० ॥ और छर्दि, तृषा, ज्वर, श्वास, पांडुरोग, क्षतक्षय, मृगीरोग, शिरकी पीड़ा, दारुण योनिशूल ॥ ६१ ॥ बहुतसा बहता हुआ योनिका रक्त,