हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 325, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्दज्वरकी पीडा, इनका नाश होता है और वृद्ध पुरुष भी जवान और कामी होता है, वंध्या स्त्री पुत्रवाली हो जाती है ॥ ६२ ॥ और जिसके वीर्य नहीं हो वह वीर्यवाला हो जाता है और स्त्रियोंको प्रिय होता है । यह कूष्मांडकावलेह सम्पूर्ण रोगोंको निवारण करता है ॥६३॥ अथ अन्यकूष्मांडका अवलेह । सुस्निग्धकूष्माण्डखण्डकानि पलानि पञ्चाशदथो सितायाः॥ युंज्यात्ततोयं प्रणिधाय धीमान् घृतेन प्रस्थं परिपक्वमेव ॥६४॥ विज्ञाय पक्वं पुनरेव तत्र वासाकषायञ्च विमिश्रयेच्च ॥ दार्वीप्र- लेपो भवतीति ज्ञात्वा चेमानि वस्तूनि पुनर्विगुञ्ज्यात् ॥६५॥ गन्धत्रयामलकरुद्रजटा च भार्गी युञ्ज्यादिमानि सकला- नि च कर्षकाणि॥धान्या पुनर्नवयुतानि च नागराणि एषां पले- न तुलिता कथिता च मात्रा ॥ ६६ ॥ श्यामापलाष्टकमिदं विदधीत चूर्णं संघट्टयेत्सकलमेव पुनस्तु दर्व्या ॥ युञ्ज्यात्समं मधुयुतं सकलामयघ्नं कासं ज्वरं क्षतजमाशु निहन्ति हिक्काम् ॥ ६७ ॥ हृद्रोगपित्तरुधिरं क्षयपीनसं च पित्ताम्लकं विजयते श्वसनं च मूर्च्छाम् ॥ स्त्रीणां हितं भवति बालकवृद्धकेषु श्रेष्ठं समस्तरोगनाशबलप्रदं च ॥ ६८ ॥ अच्छे सुन्दर कोहलाके चिकने चिकने टुकड़े बना फिर विसमें २०० तोले मिसरी मिलावे पीछे तिसमें जल मिला और ६४ तोले घृत मिला तिसको पकावे ॥ ६४ ॥ जब पक जावे तब उतार तिसमें वांसाका काथ मिलाके फिर पकावे जब कडछीमें चपकने लगजावे तब इन औषधोंको गेरे ॥ ६५ ॥ आंवला, रुद्रजटा, भारंगी, सुगंधत्रय, दालचीनी, तेजपात, इलायची इन्होंको एक एक तोला प्रमाण लेवे । सांठी, सोंठ, धनियां इन्होंको चार चार तोले गेरे और निशोथका चूर्ण ३२ तोले मिलावे पीछे इन सबोंको मिला ॥ ६६ ॥ कडछीसे घोटे फिर इसको बराबरके शहदमें मिलाके खावे । यह अवलेह खांसी, ज्वर, क्षतरोग, हिचकी ॥ ६७ ॥ हृदयरोग, पित्तरक्त, क्षयी, पीनस, पित्ताम्ल, श्वास, मूर्छा इन रोगोंको नाशता है और स्त्री, बालक, वृद्ध इनको श्रेष्ठ है, बलको देनेवाला है ॥ ६८ ॥ अथ खंडकाद्यरसायन । शतावरीमुण्डितिकामृता च फला चत्वक्पुष्करमूलभार्गी॥वृषो बृहत्या खदिरं च मांशली पृथक्पृथक् पञ्चपलैकमात्रया॥६९॥