हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २९६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- शाका हिता रक्तभवे च पित्ते मुद्गास्तथा लोहिततण्डुलाश्च ॥ ८४ ॥ यवगोधूमचणकाः कोशातक्यः पटोलकम् ॥ मुद्गा माषा हिताश्चैव रक्तपित्तनिवारणे॥८५॥हरिणशशकलावास्ति- त्तिरास्ते कुलिङ्गाः अपि च शिखिककेरक्रौञ्चपारावतानाम् ॥ पलमनिलसुपित्तार्हणं वा हितञ्च भवति बलममोघं सत्त्वते- जश्च कान्तिः॥८६॥इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने रक्तपित्तचिकित्सा नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ रक्तपित्तरोगमें मनुष्यके हितके वास्ते घाम, अग्निकी गरमाई, विदाही, खट्टा पदार्थ, कांजी, चर्चरा, कसैला पदार्थ, खारा और मदिरा इनको वर्ज देवे ॥ ८३ ॥ बथुआ चिल्ली, चौपतिया, कुरडू, जीवंतिकाशाक, सौंफ इनके शाक ये सब रक्तपित्तमें हित कहे हैं और मूंग,लाल चावल ये हित कहे हैं ॥ ८४ ॥ और जव, गेहूं, चणे, तूरीधान्य, परवल, मूंग, उडद ये अन्न रक्तपित्तको निवारण करनेमें हित कहे हैं ॥ ८५ ॥ हिरन, चौगड़ा, लावा, तीतर, चिमणापक्षी, ककेरा, मयूर, कूंजि, परेवापक्षी इनका मांस खानेसे और वातपित्तके नाशक मांसके खानेसे अमोघ बल होता है और सत्त्वगुण, तेज, कांति इनको बढ़ाता है॥८६॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने रक्तपित्तचिकित्सानाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ अथ एकादशोऽध्यायः ११. अथ अर्शचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ अथातो वक्ष्यते पुत्र अर्शसश्च चिकित्सि- तम् ॥ षट्प्रकारेण ये प्रोक्तास्तेषां च शृणु लक्षणम् ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे पुत्र ! अब अर्श अर्थात् बवासीर रोगकी चिकित्सा कहते हैं, जो छह प्रकारके बवासीरोग कहते हैं उन्होंके लक्षणको सुनो ॥ १ ॥ अथ अर्शके प्रकार । जाता दोषैस्त्रिभिरपि वातपित्तकफादिकैः ॥ सन्निपाते चतुर्थः स्यात्पञ्चमो रक्तसम्भवः ॥ २ ॥ षष्ठकः सहजो ज्ञेयश्चार्शसां षड्डिधो भवः ॥ एवं च षट्प्रकारेण जायन्ते गुदजा रुजः॥३॥