भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० ११] भाषाटीकासमेता । ( २९७) वातसे १ पित्तसे २ कफसे ३ और सन्निपातसे उपजा चौथा और रक्तसे उपजा हुआ पांचवां बवासीर रोग होता है ॥२॥ और छठा सहज अर्थात् स्वभावसे ही उपजा हुआ होता है । इस प्रकारसे गुदाके रोग छः तरहसे होते हैं ॥ ३ ॥ अथ वातार्शके हेतु और संप्राप्ति । अनशनलघुरूक्षाहारसंसेवनेन कटुलवणविदाहेः सेवयावातरो- धात् ॥ भवति सततवीप्सा विष्टरेणैव हीना कुपितमरुतवेगाद्- र्शसां भूतिरासीत् ॥४॥ अनशनोपविष्टस्य मलमूत्रावधारणे॥ शीतसंसेवनेनापि गुदजः संप्रकुप्यति ॥५॥ लवणकटुकषाया तिक्तसंसेवनेन अमितविलघुभोज्याच्छीतलेनातिरोधात् ॥ कुपितमलिननामापानमार्गेष्वपाने सृजति रुधिरवातोऽपान मार्गेमरुत्सु ॥ ६ ॥ अनशन अर्थात् भोजन नहीं करनेसे हलका और रूखा भोजन करनेसे और चर्चरा, नमक, विदाही ऐसे पदार्थके खानेसे और वातके रोकनेसे और आसनपै निरंतर नहीं बैठनेसे वायु कुपित हो जाता है,उससे बवासीर रोग हो जाता है ॥४॥जो भोजन किये बिना बैठा रहे और मलमूत्रके वेगको रोकै और शीतल वस्तुका सेवन करे उसके गुदाका वायु कुपित हो जाता है ॥ ५ ॥ नमक, चर्चरा, कसैला, कडुआ इन वस्तुओंके सेवनसे अत्यंत ज्यादे हलके भोजनसे वायु कुपित होके मलिननामवाले अपानवायुको गुदामें रहनेवालेको बिगाड़ देता है फिरवह अपा- नवायु गुदामें रक्तका रोग हो जाता है ॥ ६ ॥ अथ पित्तार्शका हेतु । कट्वम्ललवणोष्णानि विदाहीनि गुरूणि च॥ सेवनाद्वायुतोयेन श्रमाद्व्यायामपीडया॥यानव्यवायदोषाद्वा दुर्नामा पित्तसम्भवः७ और चर्चरा, खट्टा, नमक, गरम, विदाही, भारी ऐसे पदार्थके सेवनसे वायु, जल इनके सेवनेसे, श्रमसे, कसरतकी पीडासे, असवारी और मैथुनके दोषसे पित्तसे उपजा बवा- सीर होता है ॥ ७ ॥ अथ कफार्शका हेतु । अव्यायामात्तस्य शीलादजस्रं शीताद्धान्याद्वातसंसेवनाच्च ॥ लौल्यात्यम्लात्तैलसंपिच्छलेन दुर्नामा संजायते श्लेष्मरोगात् ८ कसरत नहीं करनेसे अथवा निरंतर कसरत करनेसे,शीतल वस्तुके सेवनेसे और वायुके सेव-