हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 330, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( २९८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- नेसे और जिसकी गुल्ली बंधती हो ऐसे पदार्थसे तथा अत्यंत खट्टा पदार्थ सेवनेसे कफसे उपजा हुआ बवासीर हो जाता है ॥ ८॥ अथ वातार्शका लक्षण । शीतत्वतोदं परुषं विनिद्रा गुल्मोदराष्ठीलविषूचिका वा ॥ शोफावुभौ कृष्णनखस्य नेत्रे लिङ्गानि वातप्रभवार्शसानाम्॥९॥ शीतलता रहे, व्यथा हो, कठोरता हो, निंद्रा नहीं आवे और गुल्मोदर, अष्ठीला, विषू- चिका, शोजा ये उपद्रव हों और नख, मुख, नेत्र ये काले रहें ये वायुसे उपजे हुए बवासीररो- गके लक्षण हैं ॥ ९ ॥ अथ पित्तार्शका लक्षण । दाहभ्रमौ ज्वरपिपासिशरीरतो वा मूर्च्छारुचिर्नयनदन्तमुखानि यस्य॥ पीतच्छविर्भवति वा विट्भेदनं च पित्तेन जातगुदजस्य च लक्षणानि ॥ १० ॥ दाह हो, भ्रम हो, ज्वर हो, तृषा हो, शरीरमें मूर्च्छा हो, अरुचि हो और नेत्र, दांत, मुख, ये जिसके पीले हो जावें विष्ठा ढीला हो जावे ये पित्तसे उपजे बवासीरके लक्षण हैं ॥ १० ॥ अथ कफार्शका लक्षण । निद्रा च जाड्यघनमन्दरुजा च शोफा शूलातिगुल्मगुदभङ्गुरका- स्तथा स्युः ॥ विड्बन्धतोदमरुचिर्गतिमन्दता च श्लेष्मोद्भवा गुदरुजः खलु भषजज्ञ ॥ ११ ॥ निद्रा हो, जडता हो, भारीपन हो, मंद पीडा हो, शोजा हो, शूल, अत्यन्त गुल्म, गुदाका भंग, विड्बंध, व्यथा, अरुचि, मंदगति ये लक्षण हों वह कफसे उपजा बवासीर जानना ॥ ११ ॥ अथ त्रिदोषार्शका लक्षण । शूलानाहारुचिः कासो हल्लासो रुचितोदता ॥ स्कन्धयोर्जाड्यता सर्वांश्चाशांसि संभवन्ति हि ॥ १२ ॥ शूल हो, अफारा हो, अरुचि हो, खांसी हो, थुकथुकी हो, अरुचिकी पीडा हो, कंधोंमें जडता ये सब दोषोंसे उपजे बवासीरके लक्षण हैं ॥ १२ ॥ अथ गुदरोगलक्षण । गुदजलक्षणं वक्ष्ये गदे कण्डूरसृक्स्रवः ॥ परुषा विषमा दीर्घा वातेन गुदजा मताः ॥१३॥ सदाहाश्च विचित्राश्च पीता नीला-