भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 332

( ३०० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ गुदामें अर्शका स्थान । त्रिवलीगुदमध्ये तु बाह्यतोऽभ्यन्तरेषु च ॥ अर्शासां तु विजा- नीयात्रीणि स्थानानि चैव हि ॥ २० ॥ बाह्यतः सुखसाध्यः स्यान्मध्ये कष्टेन सिध्यति ॥ असाध्योऽन्तर्वलीजातो गुदजो भिषजां वर ॥ २१ ॥ गुदाके बाहिर और भीतर त्रिवली होती है सो बवासीरोंके तीन स्थान हैं ॥ २० ॥ बाहिरके स्थानका बवासीर सुखसाध्य है और जो मध्यमें हो वह कष्टसाध्य होता है और जो गुदाके अन्तर्वलीमें हो वह असाध्य रोग कहा है ॥ २१ ॥ अथ अर्शकी चिकित्साका प्रकार । प्रलेपवर्त्तिभिः स्वेदैर्बाह्याः सिध्यन्ति चोत्तमाः॥यन्त्रशस्त्रेण मध्यास्तु अन्तर्जाश्चान्तरौषधैः ॥ २२ ॥ तस्मात्पुत्र प्रयत्नेन क्रिया कार्या विजानता ॥ येनातुरस्य रक्षा स्याद्येन रोगो निवर्त्तते ॥ २३ ॥ प्रलेप, बत्ती लगाना, स्वेद इनसे बाहिरकी पिण्डिका सिद्ध होती है और गुदाके मध्यके मस्सॉको यन्त्र शस्त्रसे सिद्ध करे और अन्तर भीतरके बवासीरको औषधोंसे सिद्ध करे ॥२२॥ हे पुत्र ! इस वास्ते जानते हुए वैद्यको ऐसी क्रिया करनी चाहिये कि, जिससे रोगीकी रक्षा हो जावे और रोग निवृत्त होवे ॥ २३ ॥ अथ अर्शरोगके उपद्रव । करचरणमुखे वा नाभिमेट्रे गुदे वा भवति हि यदि पुंसां शोफ- शोषो ज्वरश्च ॥ श्वसनतमकच्छर्दिर्मोहहृत्पार्श्वशूलं कृशमरु- चिविबन्धश्चातिसारोपसर्गाः ॥ २४ ॥ इत्येवं द्वादशार्शासां संभवन्ति ह्युपद्रवाः ॥ उपद्रवैर्विना साध्या न साध्या बहू- पद्रवाः ॥ २५ ॥ यदि मनुष्योंके हाथ, पैर, मुख, नाभि, लिंग, गुदा इनमें शोजा और शोष हो तथा ज्वर हो, श्वास हो, अन्धेरी आवे, छर्दि हो, मोह हो, हृदयमें पसलीमें शूल हो, दुर्बलता, अरुचि, मलका बन्धा, अतिसार ये होवें तो ॥ २४ ॥ ये बारह प्रकारके बवासीरके उपद्रव जानने । उपद्रवोंके बिना तो बवासीर रोग साध्य है और उपद्रवोंसहित बवासीर असाध्य है ॥ २५ ॥