भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० ११ ] भाषाटीकासमेता । ( ३०१ ) अथ असाध्य अर्श । शूलारोचकतृष्णार्त्ताश्चातिरक्तप्रवाहवान् ॥ शूलशोफातिसारार्त्तो ध्रुवं न जीवतेऽर्शसा ॥ २६ ॥ शूल, अरुचि, तृषा इनकी पीड़ावाला और रक्तके प्रवाहवाला, शोजा अतिसार इनकी पीड़ासेयुक्त ऐसा अर्शरोगवाला पुरुष नहीं जीवता है ॥ २६ ॥ अथ पाचनक्वाथ । अतोऽर्शासां प्रवक्ष्यामि क्रियां चैव भिषग्वर॥वटिकाक्षारशस्त्राणि येन संपद्यते सुखम् ॥२७॥ अर्शासां च क्रियाः प्रोक्ताश्चार्शोघ्ना बलवर्द्धनाः ॥ पित्तशोणितशमना न च वातप्रकोपनाः॥२८॥ तस्यादौ पाचनं श्रेष्ठं ततो भेषजमाहरेत् ॥ पथ्यामृता च धनिका पाने क्वाथो गुडान्वितः ॥ २९ ॥ हे उत्तम वैद्य ! अब बवासीररोगोंकी क्रियाको कहते हैं गोली, क्षार, शस्त्रक्रिया इन इला- जोंसे सुख होता है ॥ २७ ॥ अर्शरोगोंको नाशनेवाली और बलको बढ़ानेवाली अर्शरोगकी क्रिया कही है जो क्रिया रक्तपित्तको शांत करनेवाली और वातको कोप नहीं करनेवाली हो सो करनी चाहिये ॥ २८ ॥ बवासीरकी आदिमें पाचन औषध करे पीछे अन्य औषध करे और हरड़ै, गिलोय, धनियां इनका क्वाथ बना उसमें गुड़ मिला पीना चाहिये यह पाचन औषध कहा है ॥ २९ ॥ अथ कल्कयोग । दन्ती विडङ्गमगधा धान्या भल्लातकं कुष्ठगुड़ं तिलं वा ॥ एषां च कल्कः पयसा प्रयुक्तः निहन्ति पाने गुदजांश्च रोगान् ३० जमालगोटाकी जड़, वायविडंग, पीपली, धनियां, भिलावा, गुड़, तिल, कूठ इनका कल्क बना दूधसे युक्त कर भक्षण करनेसे गुदाके रोगोंको नाशता है ॥ ३० ॥ नागरपिप्पलिबिल्वविडङ्गं शटचभया त्रिवृता पयदन्ती ॥ कल्कमिदं सगुडं प्रतिपाने वार्शसि नाशनकारि नराणाम्३१ सोंठ, पीपली, बेलगिरी, वायविडंग, जमालगोटाकी जड़, कचूर,हरड़ै निशोथ और जमाल- गोटा इनका कल्क बना गुड़ मिला खानेसे मनुष्योंके बवासीररोगोंका नाश होता है ॥ ३१ ॥ अथ पत्रकादिक्वाथ । पत्रककेसरशुण्ठिसमैलातुम्बुरुधान्यविडंगतिलानाम् ॥ क्वाथो हरीतकिसर्पिर्गुडेन पीतो निहन्ति गुदे गदजानि॥३२॥