भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 334

( ३०२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- तेजपात, नागकेशर, सोंठ, इलायची, धनियां, वायविडंग, तिल, हरड़ै इनको समान ले और धनियांको दो भाग ले फिर काथ बना गुड़ मिलाके पीनेसे गुदाके रोगोंका नाश होता है॥३२॥ अथ पिप्पल्यादियोग । पिप्पलिकामभयां गुडयुक्तां प्रातरिमां यदि खादति कश्चित्॥ तस्य गुदागतकीलकमाशु निहन्ति सकामलपाण्डुजरोगान् ३३ पीपल, हरड़ै इनको गुड़में मिला प्रातःकाल जो मनुष्य भक्षण करता है उसका गुदकीलरोग शीघ्रही नष्ट होता है और कामला, पांडु इन रोगोंके समूहोंका नाश होता है ॥ ३३ ॥ अथ वार्त्ताकयोग । सुस्विन्नवार्त्ताकफलस्य तोयं दध्ना सिताह्वासलिलामृतेन ॥ पाने विधेयं गुदकीलकानां क्रिमीन्निहन्यात्क्रिमिजांश्च रोगान्३४ बैंगने स्वेदित करके इनके जलमें दही और मिसरी मिलाके और अन्यजल मिलावे पीछे इसके पीनेसे गुदकीलरोगका नाश होता है ॥ ३४ ॥ अथ भल्लातकचतुष्टय । भल्लातकाः कृष्णतिलाश्च पथ्या चूर्णं गुडेनापि नरस्य सेव्यम्॥ हन्याच्च पाने गुदकीलमेहशूलार्शकासान् विनिहन्ति तस्य३५ भिलावे, कालेतिल, हरड़ै इनके चूर्णको गुड़के संग खानेसे गुदकीलक रोग दूर होता है और प्रमेह, शूल, बवासीर, खांसी इनका नाश होता है ॥ ३५ ॥ सूरणकन्दकमर्कदलैस्तु वेष्टितमेव हि कर्दमलिप्तम् ॥ तप्तमिदं किल वह्निसमानं भक्ष्यं सैन्धवतैलविमिश्रम् ॥३६ ॥ भक्षति चार्शविनाशनहेतोर्वातविकारहितोऽपि नरस्य ॥ ३७ ॥ जमीकंदको आकके पत्तोंसें लपेट उसपै गारा लीप फिर अग्निमें स्थापित कर देवे, जब तपके अग्निके समान हो जावे तब तैल और सैंधानमक मिला और दूध मिला॥ ३६ ॥ भक्षण करनेसे बवासीर दूर होता है और वायुके विकार भी दूर हो जाते हैं ॥ ३७ ॥ अथ कल्याणनामक लवण । चित्रकपुष्करमूलशटीनां तेषु समांशास्तिला विनियोज्याः ॥ सूरणकन्दखण्डसमेतास्तेषु समोऽग्निफलानि विदध्यात् ॥ ॥ ३८ ॥ सैन्धवं तस्य चतुर्गुणकञ्च भावितमर्कदलेन सम- स्तम् ॥ तञ्च घृतस्य घटे विनिधायारण्यसुगोमयवह्निविप-