हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 335, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ११] भाषाटीकासमेता । (३०३) क्तम् ॥३९॥ क्षीरमिदं लवणाज्यविपक्कं तक्रयुतं प्रतिपानमतो- ऽपि॥ नाशयति गुदकीलककीलान्हन्ति विषूचिभगन्दररोगान् ॥४०॥कामलपाण्ड्वानाहविबन्धान्गुल्ममरोचकनाशनकारी॥ मूत्रगदं गळकण्डूक्रिमीणां नाशनभद्रकसैन्धवो नाम ॥ ४१ ॥ चीता, पोहकरमूल, कचूर इनके समान तिल और जमीकंदके टुकडे और इनके समान मालकांगनी ॥ ३८ ॥ इन सबोंसे चार भाग सैंधानमक इन सबोंको आकके पत्तोंके रसमें भावना दे पीछे इसको घृतके चिकने घड़ेमें घालके आरनोंकी अग्निमें पकावे ॥ ३९ ॥ पीछे इसको दूधमें पकावे । फिर नमक घृत इनमें पका तक्रेके संग पीनेसे गुदकीलरोगोंका नाश होता है और विषूचिका, भगंदर ॥ ४० ॥ कामला, पांडुरोग, आनाह, मलका बंधा, गुल्म, अरुचि इनका नाश होता है और मूत्ररोग, गलरोग, क्रिमिरोग इनको यह कल्याणलवण सैंधव औषध नाशता है ॥ ४१ ॥ अथ भल्लातकवटक। त्रिकटुकमगधानां मूलचित्रं त्रिगन्धं समतुलितममीषां तुल्यम- ल्लातकानि ॥ सकलमिह समन्तादेकतः सम्प्रचूर्ण्य द्विगुणतु- लितमात्रं योजनीयो गुडस्तु ॥ ४२ ॥ सकलमपि विकुव्य स्निग्धभाण्डे निधाय प्रतिदिनमपि सेव्यं चाक्षमात्रं सुधीरैः ॥ गुदजजठररोगं शूलगुल्मान्क्रिमींस्तु जनयति वडवाग्निं हन्ति पांडुं क्षयं वा ॥ ४३ ॥ त्रिकटु अर्थात् सोंठ, मिर्च, पीपल, पीपलामूल, चीता, त्रिगंध अर्थात् दालचीनी, तेजपात, इलायची इनको समान भाग लेवे और सबोंके समान भिलावे लेवे पीछे इन सबोंका एक जगह चूर्ण बना इनसे दूनी मात्रा गुड गेरे ॥ ४२ ॥ पीछे इन सबोंको कूट चिकने बरतनमें घाल घरे फिर धीर पुरुषोंको दिन दिन प्रति एक एक तोला प्रमाण खाना चाहिये यह गुदाके रोग, उदररोग, शूल, गुल्मरोग, क्रिमि, पांडु, क्षयरोग इनको नाशता है और जठराग्निको दीप्त करता है ॥ ४३ ॥ अथ प्राण देनेवाला मोदक। नागरं त्रिफलां चैव पलांस्त्रींश्च प्रयोजयेत् ॥ चतुष्पलानि मरि- चानां पिप्पलीनां पलद्वयम् ॥ ४४ ॥ पलमेकं तु चव्यस्य योज्यं तत्र भिषग्वरैः ॥ तालीसाद्धं पलं देयं पलार्द्धं पद्म-