भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० ११ ] भाषाटीकासमेता । ( ३०५ ) इन सब औषधोंसे दूना प्रमाण पुराना जमीकंद लेवे और इन सब औषधोंके समान गुड़ लेवे ॥ ५० ॥ फिर इन सबोंको कूटके मिला लेवे पीछे १ तोला प्रमाण गोली बांध लेवे । यह गोली अतिविशेष गुणयुक्त है, बवासीररोगोंको निवारण करती है और क्षयरोगवाला सुंदर कांतिसे युक्त पुष्ट हो जाता है, मंदाग्नि अत्यंत तेज होती है, श्रमका नाश होता है और हृदयरोग, पांडु, शूल, अफारा, भगन्दर इनके भयको हरनेवाली है, दुष्ट पीडा बवासीरको नाशती है ॥ ५१ ॥ योगकी युक्तिवाले कांसायनमुनिने उत्तम औषध कहा है, बुद्धिमान् पुरुष इससे सुखको प्राप्त होता है ॥ ५२ ॥ अथ लवणोत्तमादि । लवणोत्तमवह्निकलिङ्गवचाचिरबिल्वमहत्पिचुमन्दयुतम् ॥ पिब सप्तदिनं किल मस्तुजलैर्यदि मर्दितुमिच्छसि पायुरुजाम् ५३॥ सेंधानमक, चीता, इंद्रजव, वच, करंजुवा, वंकायन, इनको सात दिनतक दहीके जलसे पीवे जो यदि वायुके रोगोंको अर्थात् गुदरोगोंको नाशनेकी इच्छा हो तो ॥ ५३ ॥ अथ एलादिगुटिका । विश्वोपकुल्यामरिचानि केशरं पत्रं लवङ्गैलकवृद्धिमाह्वयाः ॥ चूर्णं हितं शर्करयुक्तमेतद्गुदामयानामुदरार्त्तिशान्तये ॥ ५४ ॥ सोंठ १ भाग, पीपल २ भाग, मिरच ३ भाग, नागकेशर ४, तेजपात ५, लोंग ६, इला- यची ७, इनको एकोत्तरवृद्धिभागसे लेवे पीछे इनके चूर्णमें खांड मिला खाना गुदाके रोग और उदरके रोगकी शांतिके वास्ते हित है ॥ ॥ ५४ ॥ अथ अर्शनाशक चतुःसममोदक । सनागरं पुष्करवृद्धदारुकं गुडो नवो मोदकमम्बुदारकम् ॥ अर्शेषु दुर्नामकरोगदारकं करोति वृद्धं सहसैव दारकम् ॥५५ सोंठ, पोहकरमूल, बिदारा ,नवीन गुड, नेत्रवाला,देवदार इन्होंका मोदक खानेसे बवासीर रोगोंका नाश होता है और वृद्ध पुरुष तत्काल बालकसरीखा निरोग या स्त्रीसे युक्त होता है ॥ ५५ ॥ अथ त्रिकटुकाद्यमोदक । त्रिकटुकमभयानां पुष्करं चित्रकाणां कृमिरिपुतिलचूर्णं कारये- त्सद्गुडेन॥उषसि वटकमेकं भक्षयेद्यो मनुष्यो विनिहितगुदरो- गश्चाग्निवृद्धिं करोति ॥ ५६ ॥ सोंठ, मिरच, पीपल, हरडै, पोहकरमूल, चीता, वायविडंग, तिल इनका चूर्ण बना उसमें २०