हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३०६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- गुड़ मिला जो मनुष्य प्रातःकाल इस मोदकको भक्षण करता है उसके गुदाके रोग दूर होते हैं और जठराग्निकी वृद्धि होती है ॥ ५६ ॥ अथ मरिचाद्यमोदक । मरिचं नागरचित्रं सूरणभागोत्तरेण संकुट्य॥सर्वसमो गुडयुक्तो मोदको बिल्वप्रमाणं सेवेत्॥विनिहितपित्तविकारं क्षयति मनु- जानां करोति तनुपुष्टिम् ॥ ५७ ॥ मिरच १ भाग, सोंठ २, चीता ३, जमीकंद ४, इनको एकोत्तरवृद्धिभागसे लेवे फिर कूटके इन सबोंके समान गुड़ मिला मोदक बांध लेवे फिर चार तोला इस मोदकको भक्षण करे यह मोदक मनुष्योंके पित्तके विकारको नाशता है और मनुष्योंके शरीरकी पुष्टि करता है ॥ ५७ ॥ अथ सूरणपिंड । त्रिसमगतसूरणकन्दो लोहितवर्णेन यो भवेन्मतिमान् ॥ षट्- खण्डीकृतवानपि संशुष्कान्षोडशान्भागान् ॥५८॥ तस्यार्द्धेन तुलितश्चित्रकशुण्ठयौ च तत्र संयोज्या॥मरिचस्य चैकभागो गुडेन बद्धस्तु मोदको मनुजैः ॥५९॥ भक्षित एव हि गुणवा- न्निहन्ति सकलान्गुदामयान् ॥ त्वरितमग्नेर्दीपनमुक्तं गुल्मानां जठररुजाम् ॥ ६० ॥ तीनों तरफसे समान और लाल वर्णवाला ऐसे जमीकंदको लेके उसके छह टुकडे बना सुखा लेवे यह जमीकंद सोलहभाग लेना चाहिये ॥ ५८ ॥ और चीता, सोंठको आठ भाग लेवे, मिरच १ भाग लेवे, पीछे इनको गुड़में मिला मोदक बांध लेवे । यह मोदक गुणवाला है ॥ ५९ ॥ और भक्षण किया हुआ गुदाके सब रोगोंको नाशता है, जठराग्निको शीघ्र ही दीप्त करता है और गुल्मरोग, जठररोगको शीघ्र ही नाशता है ॥ ६० ॥ अथ भौमवटक । त्रिफलमगधजानां मूलतालीशपत्रं क्रिमिरिपुमगधानां पुष्करं चेत्समांशः॥मरिचदहनभागश्चैकभागेन शुण्ठी सकलतुलित- तुल्यः सूरणस्यैकभागः ॥६१॥ मदनचपलयुक्तं वृद्धदारैलभृङ्गं कृतमिह परिचूर्ण द्विगुणो शीर्णखण्डः ॥ कृतवटकमुखस्तु प्राश्नुते यो मनुष्यो हरति जठररोगं तस्य चाशु प्रकर्षम्॥६२॥