हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 339, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ११ ] भाषाटीकासमेता । ( ३०७ ) गुदजरुधिरपित्तं कासमन्दाग्निशूलान् क्षयतमकहलीमान् काम- लांश्च क्रिमींश्च ॥ विदधति बलपुष्टिं दापयेच्चाशु मार्गे प्रबल- यति हुताशं योगराजः प्रसिद्धः ॥६३॥ योगराजेन युञ्जीत स्मरणेनाप्यगस्त्यतः ॥ अस्य योगस्य योगेन भीमोऽपि बहु- भक्षकः ॥ ६४ ॥ त्रिफला, पीपलामूल, तालीसपत्र, वायविडंग, पीपल, पोहकरमूलको समान भाग लेवे और मिरच, चीता ये दोनों एक भाग, सोंठ एक भाग और इन सबोंके समान जमीकंद ॥ ६१ ॥ मैनफल, गठोना, विधारा, इलायची, भंगराका चूर्ण और दूनी पुरानी खांड इनका वटक अर्थात् गोली बना जो मनुष्य खाता है उसका जठररोग शीघ्र ही दूर होजाता है ॥ ६२ ॥ और गुदाका रक्तपित्त, खांसी, मंदाग्नि, शूल, क्षयरोग, तमक, श्वास, हलीमक, कामला, क्रिमि, इन रोगोंको नाशता है और बल पुष्टि इनको बढ़ाता है जठराग्निको तेज करता है यह सब योगोंका प्रसिद्ध राजा है ॥ ६३ ॥ इस योगराजको अगस्त्यमुनिका स्मरण करके प्रयुक्त करे । इस योगके प्रतापसे भीम भी बहुत भोजनको भक्षण किया करता था ॥ ६४ ॥ अथ चव्याद्यघृत । चव्यं पाठा त्रिकटु मगधा मूलकस्तुम्बुरूणां बिल्वाजाजीरज- निसुरसा पथ्यया सैन्धवं च ॥ पिष्ट्वा चैतत्समगविघृतं पाचये- त्सुप्रयुक्तं पानाभ्यंगे हरति गुदजान्वातरोग़ाश्मरीं च॥ ६५ ॥ चव्य, पाठा, त्रिकटु "सोंठ, मिर्च, पीपल", पीपलामूल, धनियां, बेलगिरी, जीरा, हलदी, तुलसी, हरड़े, सैंधानमक, इनको पीसके बराबरके गौके घृतमें पकावे । यह घृत पीनेसे और मालिस करनेसे गुदाके रोग, पथरी इनको नाशता है ॥ ६५ ॥ अथ पिप्पल्याद्य तैल । श्यामा कुष्ठं मधुकमदनं पुष्पकं चित्रकञ्च बिल्वं दारु प्रतिवि- षशताह्वाकलिङ्गाशटीनाम्॥पिष्ट्वा तैलं द्विगुणपयसा पाचितं चानुवासे चाभ्यङ्गे वा हितमपि गुदव्याधिनिर्णाशहेतोः॥६६॥ वातव्याधिश्रवणरुधिरे कर्णशूलेऽश्मरीणां जङ्घापृष्ठे कटिशिरः- शिरावेक्षणे वाततोदे॥विष्ठाबन्धग्रहगतगदे मूढगर्भे तथैव श्रेष्ठं तैलं सकलनिचयव्याधिसंधारणेन ॥ ६७ ॥