हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 340, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३०८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- पीपली, कूठ, मुलहटी, मैनफल, मैनफलका पुष्प, चीता, बेलगिरी, देवदार, अतीशा, शतावरी, इंद्रजव, कचूर, इनको तैलमें पीस फिर दूने दूधमें पका इसको अनुवासन वस्तिमें और मालिसमें बरतैं । यह गुदाकी व्याधिके नाशके हेतुमें हित है ॥ ६६ ॥ वातव्याधि, कानका रुधिररोग, कर्णशूल, पथरी, जांघ, पीठ, कटि, शिर, इनका रोग, नाड़ियोंका फुरणा, वातकी व्यथा, मलका बंधा इनको नाशता है, ग्रहदोषको दूर करता है, मूढगर्भको दूर करता है, यह तैल संपूर्ण व्याधियोंको नाशता है ॥ ६७ ॥ अथ मुस्ताद्यवटक । मुस्ता विश्वविडंगचव्यकशटी पथ्या च तेजोवती दन्तीन्द्रात्रि- वृता समांशकपली मात्रा च प्रत्येकशः॥तस्मादष्टपलांश्च पुष्क- रमपि षड् वृद्धदारोपलान् युञ्ज्यात्षोडशसूरणाख्यसलिल- द्रोणेऽखिलं कल्कितम् ॥६८॥ भूयो वै विपचेज्जलं त्रिगुणितं चोद्धृत्य तत्रैव हि संयुञ्ज्यात्पुनरेव चित्रकत्रिवृत्तेजोवतीसूर- णम्॥एलापत्रकनागकेशरलवंगानां समं चूर्णितमेषां षोडशभा- गयोग्यविहितं सर्वञ्च तं चैकतः ॥ ६९ ॥ स्थाप्यं स्निग्धघटे प्रभातसमये तं चाक्षमात्रं वटं जीर्णे क्षीरमपि प्रभूतमतिमान् पाने तथा भोजने ॥ अर्शोगुल्मभगन्दरांश्च ग्रहणीपाण्डु तथा कामलां शूलञ्चाथ विबन्धकासक्षतजान् हन्त्याशु यक्ष्मां- स्तथा ॥ ७० ॥ नागरमोथा, सोंठ, वायविडंग, चव्य, कचूर, हरडै, तेजबल, जमालगोटाकी जड़, इंद्रायण, निशोत, इन सबोंको समान भाग चार २ तोला प्रमाण लेवे और पोहकरमूल ३२ तोले लेवे विधारा २४ तोले प्रमाण लेवे, जमीकंद ६४ तोला प्रमाण लेवे फिर इनका कल्क बना १०२४ तो० प्रमाण जलमें पकावे ॥ ६८ ॥ पीछे कडा होजावे तब तिगुना जल मिला फिर पकावे पीछे इसको नीचे उतार इलायची, तेजपात, नागकेशर, लौंग इनको समान भागले चूर्ण बनाके उसमें मिलादेवे और इनका चूर्ण इन औषधोंसे सोलहवां भाग मिलाना चाहिये ॥ ६९ ॥ पीछे इसको चीकने बरतनमें घाल घरे फिर इसको प्रातःकाल एक तोला प्रमाण भक्षण करे पीछे यह चूर्ण जरजावे तब दूध पीवे और भोजनमें भी दूधको बरतैं तो बवासीर, गुल्म, भगंदर, संग्रहणी, पांडुरोग, कामला, शूल, मलका बंधा, खांसी, क्षतजरोग, राजयक्ष्मा, इन रोगोंको नाशता है ॥ ७० ॥