भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० ११ ] भाषाटीकासमेता । ( ३०९ ) अथ भल्लातकगुड । भल्लातकानां द्विसहस्रकाणां द्रोणे जले पाच्यपदावशेषम्॥ क्वाथे तु तस्मिन् विपचेद्गुडस्य तुलाप्रमाणं पुनरेव तत्र ॥ ७१ ॥ भल्लातकानां शतपञ्चकानि तत्रैव संयोज्य पलत्रिकं वा ॥ व्योषं जवानीघन सैन्धवानामेलालवङ्गं दलनागकेशरम्॥ प्रत्ये- ककर्षं तुलितं नियोज्यं न चात्र किञ्चित् प्रविचारणीयम्॥७२॥ संकुट्य तैले घृतभाजने वा स्थाप्यं प्रभाते,वटकप्रमाणम् ॥ भक्षे- द्गुडं यो विनिहन्ति रोगान्भगन्दराशःक्रिमीयक्ष्मपाण्डून् ॥७३॥गुल्माश्मरीमेहहलीमकं वा सरक्तपित्तं ग्रहणीं निहन्ति॥ करोति पुष्टिं बलमातनोति वर्णप्रकर्षं सुखमादधाति ॥ ७४ ॥ दो हजार भिलावोंको १०२४ तोले जलमें पकावे, जब चतुर्थांश बाकी रहे तब उतार उस क्वाथमें ४०० तोले गुड़को पकावे ॥ ७१ ॥ पीछे उसमें पांचसौ भिलावे मिलावे और त्रिफला, सोंठ, मिरच, पीपल, अजवायन, नागरमोथा, सेंधानमक, इलायची, लौंग, तेजपात, नागकेशर, इनको एक २ तोला प्रमाण गेरे ॥७२ ॥ पीछे इनको अच्छी तरह कूटके मिला तैलके अथवा घृतके चीकने पात्रमें घाल धरे पीछे प्रभातसमय इसको वड़ाके प्रमाण भक्षण करे । यह गुड़ भगंदर, बवासीर, क्रिमि, राजयक्ष्मा, पांडु ॥ ७३ ॥ गुल्म, पथरी, हलीमक, रक्तपित्त, संग्र- हणी, इन रोगोंको नाशता है और पुष्टि करता है, बलको बढाता है, वर्णको सुन्दर करता है, सुख करता है ॥ ७४ ॥ अथ अन्यभल्लातकगुड । दशमूलगुडूचीसटीक्षुरकं सहचित्रकभार्ङ्गिफलासहितम्॥ भल्ला- तकपंचशतं प्रदिशेद्विपचेज्जलद्रोणमितेन च तत् ॥ ७५ ॥ गुडजीर्णशतं प्रददेत्कथितमवतार्य्य सुशीतलमेलसमम्॥ दलके- सरभृङ्गलवङ्गयुतं कृतचूर्णमिदं सकलैकमिति ॥ ७६ ॥ घृत- भावितमेकदिनं विदधीद्घृतभाजनके दिनसप्तमिदम्॥ स्निग्धघटे विदधीत मनुष्यो दत्तमिदं गुदजामयसङ्घे ॥७७॥ मोदकमेक- मुषस्सु ग्रसेद्विनिहन्ति गुदामयमेहरुजः ॥ किल कासहलीम- ककामलके हितमेव हुताशनदीप्तिकरम् ॥७८॥ यस्तु शीतजले

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