हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३१० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- क्षिप्तो जलेनैव विलीयते॥ लोहितो लोहितां याति गुडपाकस्य लक्षणम् ॥ ७९ ॥ दशमूल, गिलोय, कचूर, गोखरू, चीता, भारंगी, त्रिफला, पांचसौ मिलावे, इन्होंने १०२४ तोले जलमें पकावे ॥७५॥ पीछे इस काथमें बराबर पुराना गुड़ मिला पकाके नीचे उतार शीतल हो जावे तब तेजपात, नागकेशर, भंगरा, लौंग इनका चूर्ण बना उसमें मिला ॥७६॥ फिर एक दिनतक घृतमें भावना दे पीछे सात दिनतक घृतके पात्रमें घाल रक्खे पीछे चिकने पात्रमें इसको घाल धरे । इस मोदकको गुदाके रोगोंके समूहोंमें खावे॥७७॥एक मोदक प्रातःकाल खावे । गुदाके रोग, प्रमेह,खांसी, हलीमक,कामला इन रोगोंको नाशताहै और जठरा- ग्निको दीप्त करता है ॥ ७८ ॥ जो जलमें गेरा हुआ डूब जावे और लाल लाल वर्णवाला हो जावे यह गुड़के पाकका लक्षण है ॥ ७९ ॥ अथ भल्लातकावलेह । ग्रन्थिकं चित्रकं मुस्तं चविकं त्रिफलामृता॥सहदेवी गजकर्णा- पामार्गश्च कुठेरकम् ॥८०॥ प्रत्येकं चतुष्पालिकं कल्के द्रोणा- म्भसा सुधीः ॥ द्वे सहस्रे समे पिष्टे भल्लातक्याः फलानि तु ॥ ८१॥ पादावशेषे कल्के च लोहचूर्णं तुलार्द्धकम्॥क्षिपेत्कुड- द्वयं सर्पिः सर्वं चैकत्र घट्टयेत् ॥८२॥ फलत्रिकं तथा व्योषं चित्रकं लवणाष्टकम्॥विडङ्गानि समांशानि सर्वाणि पलमात्रया ॥ ८३ ॥ चतुष्पलं वृद्धदारोर्मूर्वाख्या तु चतुष्पला ॥ संशु- ष्कसूरणं कन्दं चूर्णं चाष्टपलोन्मितम् ॥ ८४ ॥ संक्षिप्य स्वादयेच्चूर्णमवतार्य्य सुशीतले॥स्थापितं मधु संयोज्यं कुड- वद्वयमात्रया ॥८५॥ देयं गुदामये चादौ कल्कमप्रातराशने॥ अर्शांसि ग्रहणीरोगं कामलाराजयक्ष्मणः ॥८६ ॥ गुल्मक्रिमी- नश्मरीं च मन्दाग्निमेहशोणितम्॥नाशयत्याशु यक्ष्माणंकरोति बलमाकृतेः ॥८७॥ आशु वृद्धिं प्रकुरुते वलीपलितनाशनम् ॥ रसायनस्य योगेन नरो नागबलो भवेत् ॥ ८८ ॥ गंठोना, चीता, नागरमोथा, चव्य, त्रिफला, गिलोय, सहदेवी, गजपीपली, ऊंगा, ब्वई ॥ ८० ॥ इन सबोंको सोलह सोलह तोल प्रमाण लेवे पीछे कल्क बना एक हजार