भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० ११] भाषाटीकासमेता । (३११) चौवीस १०२४ तोले प्रमाण जलमें पकावे और दोहजार भिलावोंका कल्क बना उसका काथ बनावे ॥८१॥ जब चतुर्थांश बाकी रहे तब उतार २०० तोले प्रमाण लोहाका चूर्ण मिलावे और ३२ तोले प्रमाण घृत मिला पीछे एक जगह घोट ॥ ८२ ॥ पीछे त्रिफला, सोंठ, मिरच, पीपल, चीता, आठ प्रकारके नमक, वायविडंग इन सबोंको चार चार तोला प्रमाण लेवे ॥ ८३ ॥ और भिदारा १६ तोले, मूर्वा १६ तोले और सूखा हुआ जमीकन्द ३२ तोले प्रमाण लेवे इनका चूर्ण बना उस पाकमें गेर देवे ॥ ८४ ॥ पीछे शीतल हो जावे तब ३२ तोला प्रमाण शहद मिलावे ॥ ८५ ॥ पीछे गुदाके रोगकी निवृत्तिके वास्ते इस कल्कको प्रातःकाल खावे । बवासीर, संग्रहणी, कामला, राजयक्ष्मा इन रोगोंको नाशता है ॥ ८६ ॥ गुल्म, क्रिमि, पथरी, मन्दाग्नि, प्रमेह, रक्तरोग इन रोगोंको नाशता है और बल, आकृति इनको बढाता है ॥ ८७ ॥ धातुओंकी वृद्धि करता है बुढा- पाके सफेद बालोंको दूर करता है। इस रसायनके योगसे मनुष्य हस्तीके समान बलवाला होता है ॥ ८८ ॥ अथ रक्तबवासीरकी चिकित्सा । रक्तार्शसामुपचारं वक्ष्यामि शृणु पुत्रक ॥ प्रातस्तिलान्भक्षयेच्च नवनीतविमिश्रितान् ॥ ८९ ॥ सितानागरकं युक्तं नवनीतं सशर्करम् ॥ केशरं मातुलुङ्गस्य विडंगं शर्करायुतम् ॥ ९० ॥ भक्षेत्कूष्माण्डकालेहं नवनीतेन सशर्करम् ॥ एतेन रक्तगुदजा- ञ्छमयन्ति विचक्षणाः ॥९१॥ समङ्गा शाल्मलीपुष्पं चन्दनं ककुभत्वचम्॥नीलोत्पलमजाक्षीरे पिष्ट्वा पानमसृग्ददे ॥९२॥ कुटजमूलसकेसरमुत्पलं खदिरधातकिमूलशृतं पयः॥ पिबति म्रक्षणयोगमसृग्भवं गुदजनाशनकारिविकारणम् ॥ ९३ ॥ अब रक्तके बवासीरकी चिकित्साको कहते हैं पुत्र ! सुनो, तिलोंको नौनी घृतमें मिला प्रातः भक्षण करे ॥ ८९ ॥ और मिसरी, सोंठ, नौनीघृत, खांड इनको मिला खावे और विजौराकी केशर, वायविडंग, खांड इनको खावे ॥ ९० ॥ अथवा कोहलेको नौनी घृत और खांडके, संग खावे, इन इलाजोंसे वैद्यजन रक्तकी बवासीरोंको शांत करें ॥ ९१ ॥ मंजीठ, सेंवरा पुष्प, चन्दन, अर्जुनवृक्षकी छाल, नीलाकमल, इनको बकरीके दूधमें पीस पीनेसे रक्तके रोगोंका नाश होता है ॥ ९२ ॥ कूडाकी छाल और जड़, कमलकेशर, खैरकी जड़, धवकी जड़ इनमें दूधको पका काथ बना जो मनुष्य पीता है उसकी गुदाके रक्तके रोगोंका नाश होता है ॥ ९३ ॥