भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 344

( ३१२ ) हारितसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ वर्त्तियोग । कुक्कुटस्य पुरीषञ्च तथा पारावतस्य च ॥ गृहधूमं च सिद्धार्थं धत्तूरकदलानि च ॥ काञ्जिकेन च संपिष्य वर्त्ति सञ्चारयेद्गुदे ॥ ९४ ॥ सूरणकन्दकवर्त्तिर्विधेया मल्लीरसेन घृतेन च लिप्त्वा ॥ रोगगुदे गुदकीलकमाशु नाशयेते गुदजांश्च क्रिमींश्च ॥९५॥ हरिद्रा मार्कवं कुष्ठं गृहधूमं सुवर्चलम् ॥ सिद्धार्थकरसश्चैव काञ्जिकेन च पिष्यते ॥ ९६ ॥ मधुना सह वर्त्तिः स्याद्गुदे सञ्चारिता यदि॥ अर्शासां नाशनं चैव करोति सहसा नृणाम् ९७ मुरगाकी बींट, कबूतरकी बींट, घरका धुवां, सरसों, धतूराके पत्ते, इनको कांजीमें पीस गुदामें बत्ती चढानी चाहिये ॥ ९४ ॥ जमीकंदकी बत्ती बना मोगरीके रससे और घृतसे लीपि गुदामें चढ़ानेसे गुदकीलक, गुदाके क्रिमि उन रोगोंका नाश होता है ॥ ९५॥ हलदी, भंगरा, कूट, घरका धुआं, कालानमक इनको सरसोंके रसमें और कांजीमें पीस ॥ ९६ ॥ पीछे शहद मिला बत्ती बना गुदामें चढ़ानेसे शीघ्र ही बवासीररोगोंका नाश होता है ॥ ९७ ॥ अथ देवदाल्यादि लेप । श्योनाकीपलसम्मितञ्च हुतभुग्व्योर्षै रसानां गणान्षड्ग्रन्थापि- चुमन्दवारिककणा भार्ङ्गीशिला तैलकम्॥ पिष्ट्वा श्लक्ष्णसमस्तका- ञ्जिकयुतं दत्त्वा शिलालेपनं दुर्नामानि निहन्त्यथापि गुदजा- न्सर्वातिसारामयान् ॥ ९८ ॥ सोनापाठा, चीता, व्योष अर्थात सोंठ, मिर्च, पीपल इनको चार २ तोला प्रमाण लेवे पीछे इनका रस निकाल लेवे और वच, नींबी, नेत्रवाला, पीपली, भारंगी, शिलाजीत इनको समान भाग ले पीछे तैलमें और कांजीमें तथा पूर्वोक्त औषधोंके रसमें इनको बारीक पीस शिलापै लीप देवे पीछे शिला ऊपरसे उतार गुदापै लगानेसे बवासीर, सब प्रकारके अतीसार इनका नाश होता है ॥९८॥ अथ अर्शरोगपर शस्त्रादिकर्म । यन्त्रं शस्त्राग्निकार्यञ्च कथितं तन्तु शल्यके॥ यथा यन्त्रेण छिद्यन्ते दाहस्तत्र विrate: ॥९९॥ चर्मकीलं तथा छित्त्वा दग्धं क्षारेण धीमता ॥ पक्वजम्बूंसमो वर्णो क्षारदग्धे प्रशस्यते ॥ १०० ॥ दग्धं वा सूरणक्षारं कदलीजीवमुद्गकैः। पलाशकोकिलाक्षारम-