भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० ११ ] भाषाटीकासमेता । ( ३१३ पामार्गघृतान्वितम् ॥ १०१ ॥ क्षारदाहे प्रशस्येत नवनीतघृतेन वा ॥ कुष्ठं पथ्या तथा निम्बपत्राणि च मनःशिला ॥१०२॥ तस्मान्मधुघृतमिश्रं निर्धूमाङ्गारके क्षिपेत्॥धूपयेद्गुदजांतेनयथा सम्पद्यते सुखम् ॥१०३॥ मनःशिला नागरकं सगुग्गुलं ससा- र्षपम् ॥ देवदारु सपौष्करं विशल्यासर्जजिकारसम् ॥ १०४ ॥ घृतेन धूपयेद्गुदजं गुदामयं भगन्दरम्॥निहन्ति दुष्टपीनसं व्रणं सपूयगन्धिकम् ॥१०५॥ निर्गुण्डीदलशंशुतालमथवा सत्सार्ष- पं चूर्णकं देवाह्वं घृतशर्करामधुयुतं धूपं गुदायां गते ॥ दुर्नामे सरुजे व्रणे च विषमे दुष्टे विसर्पेषु च पामापीनसकासनाशन- करो धूपो ग्रहोच्छेदनः ॥ १०६ ॥ यन्त्र, शस्त्र तथा अग्निकर्म कहा है वह शल्यतन्त्रमें कहा है और जो यन्त्रसे छेदन किया जावे वहां दाह करना चाहिये ॥ ९९ ॥ चर्मकीलको छेदन करके क्षारसे दग्ध करे और जो पक्का हुआ जामनके फलके समान वर्णवाला हो वह क्षारसे दग्ध करना श्रेष्ठ कहा है ॥ १०० ॥ जमीकन्दका खार, केला, जीवक, मूंग इनके खारसे दग्ध करना श्रेष्ठ कहा है और केशु, तालमखाना, ऊंगा इनको खारके घृतमें युक्त कर अथवा नौनीघृतमें युक्त कर ॥१०१॥ क्षारदाह करना श्रेष्ठ कहा है और कूठ, हरडै, नींबके पत्ते, मनसिल ॥ १०२ ॥ इनको शहदमें मिला धूवोंसे रहित हुए अंगारपै गेरे पीछे उससे गुदाके मस्सोंके धूमनी देवे तब रोगीको सुख प्राप्त होता है ॥ १०३ ॥ मनसिल, सोंठ, गूगल, सिरसम, देवदार, पोहकरमूल, कलहारी, साजीखार ॥ १०४ ॥ इनको घृतमें मिला धूप देनेसे बवा- सीरका मस्सा, गुदाके रोग, भगंदर, दुष्टपीनस, रादिकी गन्धसे युक्त व्रण, इनको नाशता है ॥ १०५ ॥ संभालूके पत्ते, तेजपात, हरताल, सरसोंका चूर्ण, देवदार, इनको घृत, खांड, शहदमें मिला धूप देनेसे गुदाके रोग दूर होते हैं। पीड़ासहित बवासीर, विषम और दुष्ट विसर्परोग, पामा, पीनस, खांसी, इन रोगोंको नाशता है और यह धूप ग्रहदोषको दूर करता है ॥ १०६ ॥ अथ अर्शरोगमें पथ्य । एवं क्रियाविधिः प्रोक्तश्चातः पथ्यानि मे शृणु ॥ शालिषष्टिक- मुद्गाश्च कुलत्थाढक्यवास्तुकम् ॥१०७॥ चिल्ली च शतपुष्पा च `` कूष्माण्डकपटोलकम् ॥ कारवेल्लं च तुण्डीरं सूरणो राजिकार्ज-