भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 346

( ३१४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- कम् ॥१०८॥ गुडस्तक्रं घृतं चैतत्प्रशस्यन्तेऽर्शसां सदा ॥ सूकरः शल्लकी गोधा मूषको वा सरीसृपः ॥ १०९ ॥ लावति- त्तिरवार्त्ताकमांसानि कथितानि च ॥११०॥ वल्लूरमत्स्यदधि- पिच्छलतैल बिल्ववार्त्ताक भोजनमतिप्रतिवर्जनीयम् ॥ नैसर्गिकं निशि दिवा शयनञ्च शीतं शीतान्तमेव परिवर्जितमादरेण १११ इत्यात्रेय भाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने अर्शश्चिकित्सा नामै- कादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ इस प्रकारसे क्रियाओंकी विधि कही है । अब पथ्यवस्तुओंको कहते हैं-सालिसंज्ञक चावल, सांठी चावल, मूंग, कुलथी, तुरीधान्य, बथुवा ॥ १०७ ॥ चिल्लीशाक अर्थात् बथुवाके भेद, सौंफ, कोहला, परवल, करेला, तोरी, जमीकंद, सिरसमकी डांकल इनका भोजन और शाक हित कहा है ॥ १०८ ॥ गुड़, तक्र, घृत ये बवासीरवालोंको हित हैं और शूकर, शेह गोह, मूंसा, सर्प आदि ॥ १०९ ॥ लावा, तीतर, बत्तक, इनके मांस, पथ्य कहे हैं॥११०॥ सूखा मांस, मत्स्यका मांस, दही, झागोंवाला, पदार्थ, तैल, बेलगिरी, बत्तकका मांस, इनका भोजन नहीं करे और रात्रिमें प्रकृतिके अनुसार शयन करे, दिनमें नहीं सोवे और शीतल पदार्थोंको वर्ज देवे ॥ १११ ॥ इति बेरीनिवासिबुधाशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादि- तहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ द्वादशोऽध्यायः १२. अथ खांसीकी चिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ अथ वक्ष्यामि कासानां निदानं सचिकित्सि- तम् ॥ कासांश्चाष्टविधांश्चैव शृणु पुत्र महामते ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-इससे अनन्तर कास अर्थात् खांसीरोगोंका चिकित्सासहित निदान कहते हैं, खांसी आठ प्रकारसे होती है सो हे पुत्र ! हे महामते ! सुनो ॥ १ ॥ अथ कासरोगके हेतु । हास्यात्प्रहास्यरजसानिलसंनिरोधान्मार्गेऽप्यतीव गमनादथ भोजनस्य ॥ वेगावरोधनिरतात्क्षवथोस्तथैव संजायतेऽपि मनुजां प्रतिधाम कासः ॥ २ ॥ संसेवनान्मधुरपिच्छलजाग-