हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 347, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १२] भाषाटीकासमेता । (३१५) रेण स्वप्नैर्दिवातिदधिगौलयहिमाशनैेन ॥ संजायते मदनतैल- मथाल्पकन्दी मद्येन वा किल कफस्य जर्निर्नियुक्ता ॥ ३ ॥ हास्यसे, हँसीके और वायुके रोकनेसे, मार्गमें विशेष गमन करनेसे, भोजनका वेग रोकनेसे, छींकके रोकनेसे, मनुष्योंको खांसी रोग होता है ॥ २ ॥ मधुर तथा झागोंवाले पदार्थके सेवनेसे, जागनेसे, दिनमें सोनेसे और अत्यंत दही, गुल्ली बंधनेवाला पदार्थ, ठण्डा पदार्थ इनके भोजन करनेसे तथा मैनफल, तैल, अल्प कंद, इनके भक्षण करनेसे, मदिरा पीनेसे खांसीमें कफ उत्पन्न होता है ॥ ३ ॥ अथ कासरोगकी संप्राप्ति । ऊर्ध्वं गतोदानविपर्ययेण कफेन प्राणानुगतेन दीर्घः ॥ हृदं निरेत्य कफकासकण्ठे करोति तेनापि च काससंज्ञाम् ॥४॥ कंठमें रहनेवाला उदानवायुके विपरीत होजानेसे कफके संग प्राणवायुके दीर्घ संग होनेसे हृदयमें प्राप्त हुआ कफ खांसीके संग कंठमें प्राप्त हो जाता है उससे खांसी रोग होता है ॥ ४ ॥ अथ कासरोगके प्रकार । कासाश्चाष्टौ समुद्दिष्टाः क्षतजोऽन्यः प्रकीर्तितः॥ वातिकः पैत्ति- कश्चैव श्लैष्मिकः सान्निपातकः ॥५॥ वातपित्तसमुद्भूतः श्लेष्म- पित्तसमुद्भवः॥ सप्तमो लोहितेनात्र चाष्टमो जायते क्षयात् ॥६॥ न वातेन विना श्वासःकासो न श्लेष्मणा विना॥ न रक्तेन विना पित्तं न पित्तरहितः क्षयः ॥७॥ कथितः सम्भवः श्वासस्यातो वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ येन संलक्ष्यते नृणां कासश्चाष्टविधः परः ॥ ८ ॥ खांसी आठ प्रकारसे भी होती है, एक खांसी क्षतज होती है, वातसे १, पित्तसे २, कफसे ३, सन्निपातसे ४, वातपित्तसे ५, कफपित्तसे ६ और सातमी रक्तसे और आठमी क्षयसे होती है॥ ५॥ ६ ॥ वातके विना श्वास नहीं होता, कफके विना खांसी नहीं होती, रक्तके विना पित्त नहीं होता, पित्तके विना क्षयरोग नहीं होता यह सिद्धान्त है ॥ ७ ॥ श्वासकी उत्पत्ति तो कह दी है अब लक्षण कहते हैं जिससे मनुष्योंको आठ प्रकारकी खांसी जानी जावेगी ॥ ८ ॥