हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 348, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३१६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ वातसे उपजी खांसीके लक्षण । क्षीणेन्द्रियः पार्श्वरुजोऽतिवेगः शूलावृत्तो वा गलके च बद्धः॥ निद्राकृतिर्भिन्नरवो मनुष्यो वातेन कासस्य भवेत्प्रकाशः॥९॥ इंद्रिय क्षीण हों, पसलीमें पीडा हो, अत्यंत वेग हो, शूल हो, गलबंधा रहे, निद्रासी आवे स्वर फटा रहे तो वातसे उपजी खांसी जाननी ॥ ९ ॥ अथ पित्तसे उपजी खांसीके लक्षण । कण्ठे विदाहो ज्वरशोषमूर्च्छास्तृष्णाभ्रमः पित्तभवे च कासे ॥ आस्ये कटुत्वं च शिरोऽर्त्तिपित्तं निष्ठीवते पीतनखानि नेत्रे १० कंठमें दाह हो, ज्वर, शोष, मूर्च्छा, तृषा, भ्रम ये हों तब पित्तसे उपजी खांसी जाननी और मुखमें कडुआपान हो, पित्त थूके, शिरमें पीडा हो, नख, नेत्र ये पीले रहें ॥ १० ॥ अथ कफकी खांसीके लक्षण । जाड्यं वमिः पाण्डुभवं च कासं निष्ठीवते यः सघनं कफं वा ॥ भक्तारुचिर्वा कफपूर्णदेहे घनःस्वरःश्लेष्मभवे च कासे॥११॥ जडता हो, वमन हो, पिलास लिये सुफेद और चिकना करडा कफ थूके, भोजनमें अरुचि हो, कफसे पूर्ण शरीर हो, भारी स्वर हो, ये कफसे उत्पन्न हुई खांसीके लक्षण हैं ॥ ११ ॥ अथ त्रिदोषकी खांसीके लक्षण । कण्डूदाहश्वासच्छर्द्दिशोषारोचकपीडिताः ॥ शिरोऽर्त्तिशोफह्र- ल्लासःकासे त्रिदोषसम्भवे॥१२॥कासः कण्डूःपिपासा च कुक्षि- शूलो विनिद्रता ॥शुष्ककासःपिपासा च वातपित्तोद्भवः कफः ॥१३॥ धूमगन्धः पीतवर्णोऽक्षिप्रपाकी सरक्तकः ॥ रक्तनेत्रः पिपासाद्यः पित्तश्लेष्मान्वितः कफः ॥ १४ ॥ खाज हो, दाह हो, श्वास हो, छर्दि हो, शोष हो, अरुचिकी पीडा हो, शिरमें पीडा हो, शोजा हो, थुकथुकी हो, ये त्रिदोषसे उपजी खांसीके लक्षण हैं ॥१२॥ खांसीकी धसक हो, खाज हो, तृषा हो, कुक्षिमें शूल हो, निद्रा नहीं आवे, सूखी खांसी हो तो वातपित्तसे उपजा कफ अर्थात् खांसी जाननी ॥ १३ ॥ धूवां सरीखी गंध हो, पीला वर्ण हो, आंखि पकजावें, कफमें रक्त, अति लाल नेत्र हो तो पित्तकफसे उपजी खांसी जाननी ॥ १४ ॥ अथ क्षतजखांसाक लक्षण । व्यवायातिप्रसङ्गेन वेगरुद्धाभिघातकः ॥ भारोद्धरणयातेन