हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १२ ] भाषाटीकासमेता । ( ३१७ ) जायते क्षतजः कफः ॥१५॥ तेन हृदि व्यथा रूक्षं कासते च स- शोणितम्॥श्वासः संक्षीयते गात्रं दीनो मन्दज्वरातुरः ॥१६॥ वेपते पर्वभेदश्च मोहभ्रमनिपीडितः । एवं क्षतजनिर्दिष्टो नृणां प्राणापहारकः ॥ १७ ॥ मैथुनके अत्यंत प्रसंगसे, वेगके रोकनेसे, अभिघातसे और बोझाके उठानेसे क्षतसे उपजा- हुआ कफ जानना ॥ १५ ॥ उस करके हृदयमें पीडा हो, रूखी खांसी आवे अथवा खांसीमें रक्त आवे, श्वास हो,गात्र क्षीण हुआजावे,गरीब रहे, मंदज्वरकी पीडा रहे, कंपना रहे, हड्फूटन हो, मोह, भ्रम, इनकी पीडा हो ऐसे मनुष्योंके क्षतज अर्थात् चोटसे उपजीहुई खांसी जाननी यह प्राणको हरनेवाली खांसी है ॥ १६ ॥ १७ ॥ अथ रक्तकी खांसीके लक्षण । अल्पायासात्क्षतात्क्षीणात्संपातात्क्षणभोजनात्॥ पातनाघात- योगेन जायते रक्तजः कफः ॥१८॥ विस्रगन्धास्यहृच्छूलदीनो वै विकलेन्द्रियः ॥ रक्तनिष्ठीवनोपेतः श्वासो वापि मदातुरः ॥ १९ ॥ क्षीयते सततं गात्रं मोहस्तृष्णा च जायते ॥ इत्येतै- र्लक्षणैर्युक्तं रक्तकासं विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥ कुछ परिश्रम करनेसे, चोटसे, क्षीण होनेसे, गिरनेसे और दुष्टभोजनसे,गिरनेके घातके योगसे रक्तसे उपजाहुआ कफ होजाता है ॥ १८ ॥ मुखमें बुरी गंध आवे, हृदयमें शूल हो, गरीब रहे, इंद्रिय विकल रहें, रक्तके थूकनेसे युक्त हो, श्वास हो, मदसे पीड़ित हो ॥ १९ ॥ शरीर निरंतर क्षीणहुआ जावे, मोह हो,तृषा हो, इन लक्षणोंसे जो युक्त हो वह रक्तसे उपजी खांसी जाननी ॥ २० ॥ अथ सबप्रकारकी खांसियोंके लक्षण । अथ क्षयानुमानेन लक्ष्यते कासलक्षणम् ॥ पाण्डुरोगे तथा यक्ष्मे गुल्मे वापि क्षतक्षये॥२१॥ शोफार्शसां प्रतिश्याये चाव- श्यं काससम्भवः ॥ एतेषां चानुमानेन कासं संलक्षयेद्भृशम् ॥ २२ ॥ स्थवरिणां रक्तकासः सोऽपि याप्यः प्रकीर्त्तितः ॥ बालानां जायते कासो धात्रीवैकल्पयोगतः ॥ २३ ॥ एते