हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३१८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थानं-
कासाः समुद्दिष्टा दशभिर्भिषगुत्तमैः ॥ तेषां क्रियाप्रतीकारः पथ्यभेषजमेव च ॥ २४ ॥ इससे अनंतर क्षयके अनुमान करके खांसीका लक्षण कहते हैं । पांडुरोग, राजयक्ष्मा, गुल्म, क्षतक्षय, शोजा, बवासीर, पीनस इनमें अवश्य खांसी होजाती है इनके और अनुमानसे अत्यंत खांसीका लक्षण जानना ॥ २१ ॥ २२ ॥ वृद्ध पुरुषोंको जो रक्तसहित खांसी होती है वह याप्यरोग कहाता है और धायके विकलताके योगसे बालकोंको खांसी उत्पन्न होती है इन दशप्रकारके लक्षणों करके वैद्यजनोंने खांसी कही है सो उनके बंद करनेवाली क्रियाओंको कहते हैं और पथ्य औषधोंको कहते हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥ अथ वातकी खांसीकी चिकित्सा । शतमूलिकायाः कथितः कषायः पीतः कणाचूर्णयुतः सुखोष्णः॥ नृणां निहन्यान्मरुतोद्भवं तु कासं सशूलं च विपाचनं स्यात् ॥२५॥ भार्ङ्गी शटीगोस्तनिशृङ्गवेरशृङ्गीकणाचूर्णयुतोऽवलेहः॥ गुडेन तैलेन हितो नराणां कासस्य वायोश्च विकारहंता ॥ २६ ॥ नागरं पुष्करं दारु दुस्पर्शकं पिप्पली मुस्तकं रास्ना च शटी ॥ भार्ङ्गिका शर्करा संयुतं चूर्णं कं हन्ति कासं विनिःश्वासवातोद्भवम् ॥ २७ ॥ महाशतावरीका काथ बना उसमें पीपलका चूर्ण मिला सुखसे सुहाता हुआ गरम २ पीनेसे मनुष्योंके वातसे उपजी हुई शूलसहित खांसी दूर होती है और पकजाती है ॥ २५ ॥ भारंगी, कचूर, दाख, अदरक, काकडासींगी, पीपल, इनका चूर्ण बना गुड़में और तेलमें अवलेह बना चाटनेसे वातसे उपजी हुई खांसी दूर होती है ॥ २६ ॥ सोंठ, धमासा, काकड़ासींगी, कचूर, पोहकरमूल, देवदार, भारंगी, पीपल, नागरमोथा, रास्ना इनका चूर्ण बना खांड मिला खानेसे श्वासरहित वातकी खांसी दूर होती है ॥ २७ ॥ अथ कट्फलआदि औषध । कट्फलं रोहिषं धान्यं भार्ङ्गी मुस्ता वचा तथा ॥ कर्कटं पर्पटं दार्वी देवदारु च नागरम्॥२८॥कल्कतं मधुना युक्तं पानमस्य न संशयः॥ कासश्लेष्मप्रतीकारमनेन किल निश्चितम् ॥ २९ ॥ शोषवातक्षयं कण्ठग्रहं पीनसकं कफम् ॥ हिक्कां कफज्वरं चैव नाशयत्याश्वसंशयम् ॥ ३० ॥