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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

( ३१६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ वातसे उपजी खांसीके लक्षण । क्षीणेन्द्रियः पार्श्वरुजोऽतिवेगः शूलावृत्तो वा गलके च बद्धः॥ निद्राकृतिर्भिन्नरवो मनुष्यो वातेन कासस्य भवेत्प्रकाशः॥९॥ इंद्रिय क्षीण हों, पसलीमें पीडा हो, अत्यंत वेग हो, शूल हो, गलबंधा रहे, निद्रासी आवे स्वर फटा रहे तो वातसे उपजी खांसी जाननी ॥ ९ ॥ अथ पित्तसे उपजी खांसीके लक्षण । कण्ठे विदाहो ज्वरशोषमूर्च्छास्तृष्णाभ्रमः पित्तभवे च कासे ॥ आस्ये कटुत्वं च शिरोऽर्त्तिपित्तं निष्ठीवते पीतनखानि नेत्रे १० कंठमें दाह हो, ज्वर, शोष, मूर्च्छा, तृषा, भ्रम ये हों तब पित्तसे उपजी खांसी जाननी और मुखमें कडुआपान हो, पित्त थूके, शिरमें पीडा हो, नख, नेत्र ये पीले रहें ॥ १० ॥ अथ कफकी खांसीके लक्षण । जाड्यं वमिः पाण्डुभवं च कासं निष्ठीवते यः सघनं कफं वा ॥ भक्तारुचिर्वा कफपूर्णदेहे घनःस्वरःश्लेष्मभवे च कासे॥११॥ जडता हो, वमन हो, पिलास लिये सुफेद और चिकना करडा कफ थूके, भोजनमें अरुचि हो, कफसे पूर्ण शरीर हो, भारी स्वर हो, ये कफसे उत्पन्न हुई खांसीके लक्षण हैं ॥ ११ ॥ अथ त्रिदोषकी खांसीके लक्षण । कण्डूदाहश्वासच्छर्द्दिशोषारोचकपीडिताः ॥ शिरोऽर्त्तिशोफह्र- ल्लासःकासे त्रिदोषसम्भवे॥१२॥कासः कण्डूःपिपासा च कुक्षि- शूलो विनिद्रता ॥शुष्ककासःपिपासा च वातपित्तोद्भवः कफः ॥१३॥ धूमगन्धः पीतवर्णोऽक्षिप्रपाकी सरक्तकः ॥ रक्तनेत्रः पिपासाद्यः पित्तश्लेष्मान्वितः कफः ॥ १४ ॥ खाज हो, दाह हो, श्वास हो, छर्दि हो, शोष हो, अरुचिकी पीडा हो, शिरमें पीडा हो, शोजा हो, थुकथुकी हो, ये त्रिदोषसे उपजी खांसीके लक्षण हैं ॥१२॥ खांसीकी धसक हो, खाज हो, तृषा हो, कुक्षिमें शूल हो, निद्रा नहीं आवे, सूखी खांसी हो तो वातपित्तसे उपजा कफ अर्थात् खांसी जाननी ॥ १३ ॥ धूवां सरीखी गंध हो, पीला वर्ण हो, आंखि पकजावें, कफमें रक्त, अति लाल नेत्र हो तो पित्तकफसे उपजी खांसी जाननी ॥ १४ ॥ अथ क्षतजखांसाक लक्षण । व्यवायातिप्रसङ्गेन वेगरुद्धाभिघातकः ॥ भारोद्धरणयातेन

अ० १२ ] भाषाटीकासमेता । ( ३१७ ) जायते क्षतजः कफः ॥१५॥ तेन हृदि व्यथा रूक्षं कासते च स- शोणितम्॥श्वासः संक्षीयते गात्रं दीनो मन्दज्वरातुरः ॥१६॥ वेपते पर्वभेदश्च मोहभ्रमनिपीडितः । एवं क्षतजनिर्दिष्टो नृणां प्राणापहारकः ॥ १७ ॥ मैथुनके अत्यंत प्रसंगसे, वेगके रोकनेसे, अभिघातसे और बोझाके उठानेसे क्षतसे उपजा- हुआ कफ जानना ॥ १५ ॥ उस करके हृदयमें पीडा हो, रूखी खांसी आवे अथवा खांसीमें रक्त आवे, श्वास हो,गात्र क्षीण हुआजावे,गरीब रहे, मंदज्वरकी पीडा रहे, कंपना रहे, हड्फूटन हो, मोह, भ्रम, इनकी पीडा हो ऐसे मनुष्योंके क्षतज अर्थात् चोटसे उपजीहुई खांसी जाननी यह प्राणको हरनेवाली खांसी है ॥ १६ ॥ १७ ॥ अथ रक्तकी खांसीके लक्षण । अल्पायासात्क्षतात्क्षीणात्संपातात्क्षणभोजनात्॥ पातनाघात- योगेन जायते रक्तजः कफः ॥१८॥ विस्रगन्धास्यहृच्छूलदीनो वै विकलेन्द्रियः ॥ रक्तनिष्ठीवनोपेतः श्वासो वापि मदातुरः ॥ १९ ॥ क्षीयते सततं गात्रं मोहस्तृष्णा च जायते ॥ इत्येतै- र्लक्षणैर्युक्तं रक्तकासं विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥ कुछ परिश्रम करनेसे, चोटसे, क्षीण होनेसे, गिरनेसे और दुष्टभोजनसे,गिरनेके घातके योगसे रक्तसे उपजाहुआ कफ होजाता है ॥ १८ ॥ मुखमें बुरी गंध आवे, हृदयमें शूल हो, गरीब रहे, इंद्रिय विकल रहें, रक्तके थूकनेसे युक्त हो, श्वास हो, मदसे पीड़ित हो ॥ १९ ॥ शरीर निरंतर क्षीणहुआ जावे, मोह हो,तृषा हो, इन लक्षणोंसे जो युक्त हो वह रक्तसे उपजी खांसी जाननी ॥ २० ॥ अथ सबप्रकारकी खांसियोंके लक्षण । अथ क्षयानुमानेन लक्ष्यते कासलक्षणम् ॥ पाण्डुरोगे तथा यक्ष्मे गुल्मे वापि क्षतक्षये॥२१॥ शोफार्शसां प्रतिश्याये चाव- श्यं काससम्भवः ॥ एतेषां चानुमानेन कासं संलक्षयेद्भृशम् ॥ २२ ॥ स्थवरिणां रक्तकासः सोऽपि याप्यः प्रकीर्त्तितः ॥ बालानां जायते कासो धात्रीवैकल्पयोगतः ॥ २३ ॥ एते

( ३१८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थानं-

कासाः समुद्दिष्टा दशभिर्भिषगुत्तमैः ॥ तेषां क्रियाप्रतीकारः पथ्यभेषजमेव च ॥ २४ ॥ इससे अनंतर क्षयके अनुमान करके खांसीका लक्षण कहते हैं । पांडुरोग, राजयक्ष्मा, गुल्म, क्षतक्षय, शोजा, बवासीर, पीनस इनमें अवश्य खांसी होजाती है इनके और अनुमानसे अत्यंत खांसीका लक्षण जानना ॥ २१ ॥ २२ ॥ वृद्ध पुरुषोंको जो रक्तसहित खांसी होती है वह याप्यरोग कहाता है और धायके विकलताके योगसे बालकोंको खांसी उत्पन्न होती है इन दशप्रकारके लक्षणों करके वैद्यजनोंने खांसी कही है सो उनके बंद करनेवाली क्रियाओंको कहते हैं और पथ्य औषधोंको कहते हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥ अथ वातकी खांसीकी चिकित्सा । शतमूलिकायाः कथितः कषायः पीतः कणाचूर्णयुतः सुखोष्णः॥ नृणां निहन्यान्मरुतोद्भवं तु कासं सशूलं च विपाचनं स्यात् ॥२५॥ भार्ङ्गी शटीगोस्तनिशृङ्गवेरशृङ्गीकणाचूर्णयुतोऽवलेहः॥ गुडेन तैलेन हितो नराणां कासस्य वायोश्च विकारहंता ॥ २६ ॥ नागरं पुष्करं दारु दुस्पर्शकं पिप्पली मुस्तकं रास्ना च शटी ॥ भार्ङ्गिका शर्करा संयुतं चूर्णं कं हन्ति कासं विनिःश्वासवातोद्भवम् ॥ २७ ॥ महाशतावरीका काथ बना उसमें पीपलका चूर्ण मिला सुखसे सुहाता हुआ गरम २ पीनेसे मनुष्योंके वातसे उपजी हुई शूलसहित खांसी दूर होती है और पकजाती है ॥ २५ ॥ भारंगी, कचूर, दाख, अदरक, काकडासींगी, पीपल, इनका चूर्ण बना गुड़में और तेलमें अवलेह बना चाटनेसे वातसे उपजी हुई खांसी दूर होती है ॥ २६ ॥ सोंठ, धमासा, काकड़ासींगी, कचूर, पोहकरमूल, देवदार, भारंगी, पीपल, नागरमोथा, रास्ना इनका चूर्ण बना खांड मिला खानेसे श्वासरहित वातकी खांसी दूर होती है ॥ २७ ॥ अथ कट्फलआदि औषध । कट्फलं रोहिषं धान्यं भार्ङ्गी मुस्ता वचा तथा ॥ कर्कटं पर्पटं दार्वी देवदारु च नागरम्॥२८॥कल्कतं मधुना युक्तं पानमस्य न संशयः॥ कासश्लेष्मप्रतीकारमनेन किल निश्चितम् ॥ २९ ॥ शोषवातक्षयं कण्ठग्रहं पीनसकं कफम् ॥ हिक्कां कफज्वरं चैव नाशयत्याश्वसंशयम् ॥ ३० ॥

४. चतुर्थ स्थान: सूत्र एवं कल्प स्थान (औषध निर्माण, तैल व घृत)

.अ० १२ ] भाषाटीकासमेता । ( ३१९ ) कायफल, रोहिषतृण, भारंगी, नागरमोथा, वच, धनिया, पित्तपापड़ा, देवदारु, दारुहलदी, सोंठ, काकड़ासिंगी ॥ २८॥ इनका कल्क बना शहद मिला पीना हित है। इस औषधसे खांसी और कफ दूर होता है ॥२९॥ क्षय, पीनस, कंठग्रह, वातसे उपजा शोष,कफ, हिचकी, कफसे उपजा ज्वर इनको नाशता है ॥ ३० ॥ अथ द्राक्षादि औषध । द्राक्षामलक्याः फलपिप्पलीनां कोलं सखर्जूरयुतोऽवलेहः ॥ निहन्ति कासं क्षयरक्तपित्तान् सकासलं पाण्डु हलीमकञ्च ॥३१॥ दाख, आंवला, पीपल, चव्य, खजूर इन्होंका अवलेह बना चाटनेसे रक्तपित्त, खांसी, क्षयरोग इनका नाश होता है, कामला, पांडुरोग,हलीमक इनको नाशता है ॥ ३१ ॥ अथ वालकादि कल्क । वालाबृहत्यौ मधुकं वृषं च तथैव कुष्ठं पिचुमन्दकञ्च ॥ गवास्तनीसंयुतकल्कमेतत्पानं हितं पित्तकफात्मके च॥ ३२ ॥ नेत्रवाला, छोटी कटेहली, बडी कटेहली, मुलहठी, वांसा, कूट, नींव, दाख इनका कल्क बना पित्तकफसे उपजी हुई खांसीमें पीना हित है ॥ ३२ ॥ अथ मुस्ता चूर्ण । मुस्ताटरूषकफलत्रिकदारुभाङ्गी व्याघ्रीसपुष्पफलमूलदलैरु- पेता॥रास्ना विषातुलसिका विहितं सुचूर्णं क्वाथेन हन्ति किल कासमिदं न चिन्त्यम् ॥ ३३ ॥ बद्धाथवा च गुटिका मधुना गुडेन सिन्धूद्भवैन मगधासमहौषधेन ॥ आस्ये धृता निशि वि- शालगुणा भवन्ति श्वासं क्षयं क्षतजकासमिदं निहन्ति ॥ ३४ ॥ नागरमोथा, वांसा, त्रिफला, देवदार, भारंगी और पुष्प, फल, मूल, पत्ते इन पंचांगोंसहित कटेहली, रास्ना, अतीश, श्रेष्ठ तुलसीके पत्ते, इनका चूर्ण बना, जलमें क्वाथ बना पीनेसे खांसी दूर होती है ॥ ३३ ॥ अथवा इस चूर्णको शहद तथा गुड़में मिला और सैंधानमक, पीपल, सोंठ ये मिला गोली बांध मुखमें धरे । रात्रीके समयमें यह उत्तम गुणवाली कही है और श्वास, क्षय, क्षतसे उपजी खांसी इनको नाशती है ॥ ३४ ॥ अथ पित्तकी खांसीकी चिकित्सा । शर्करा चवखर्जूरं द्राक्षा लाजा कणा मधु ॥ सर्पिर्युतो हितो लेहः पित्तकासनिवारणः ॥३५॥ आटरूषकपत्राणि पिचुमन्द-

( ३२० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- दलानि च ॥ तुलसीस्वरसञ्चैव शटी शृङ्गी मरीचकम् ॥३६॥ शुण्ठीचूर्णं गुडे युक्तं लिह्यात्कासे कफात्मके ॥ भार्ग्याश्च नागपिप्पल्याः पिबेत्क्वाथं सुखोष्णकम् ॥३७॥ आर्द्रकस्य रसं नीत्वा मधुना च पिबेत्सुधीः॥कासे श्वासे प्रतिश्याये ज्वरे श्लेष्मसमुद्भवे ॥ ३८ ॥ कट्फलं भूतृणं भार्गी शुण्ठी पर्पटकं वचा ॥सुराह्वं च जलशृतमुक्तञ्च पण्डितैस्तथा ॥३९ ॥ मधुना संयुक्तं पानं कासे वातकफात्मके ॥ श्वासे हिक्काज्वरे शोषे महा- कासे च दारुणे ॥ ४० ॥ खांड, खजूर, दाख, धानकी खील, पीपल, शहद इन औषधोंके चूर्णमें घृत मिला लेह बना चाटनेसे पित्तकी खांसी दूर होती है ॥ ३५ ॥ वांसाके पत्ते, नींवके पत्ते, तुलसीका रस और कचूर, काकड़ासींगी, मिरच ॥ ३६ ॥ सोंठ, इनका चूर्ण बना गुड़में मिला चाट- नेसे कफसे उपजी खांसी दूर होती है और भारंगी, गजपीपली इनका काथ सुखसे सुहाता हुआ गरम २ पीवे ॥ ३७ ॥ अदरखका रस निकाल शहदके संग पीना खांसी, श्वास, पीनस, कफसे उपजा ज्वर इनमें श्रेष्ठ है ॥ ३८ ॥ कायफल, रोहिषतृण, भारंगी, सोंठ, पित्तपापडा, वच, देवदार इनको जलमें पकावे ऐसे पंडितोंने कहाहै ॥ ३९ ॥ पीछे शहद मिला पीनेसे वात कफसे उपजी खांसी दूर होती है और श्वास, हिचकी, ज्वर, शोष, महा- दारुण खांसी इनमें श्रेष्ठ है ॥ ४० ॥ अथ लघुतालीसआदि औषध । तालीसपत्रं मरिचञ्च विश्वाश्यामायुतं चोत्तरभागवृद्धया ॥ त्वक्पत्रकेणापि लवङ्गमेलामष्टौ कणाया गुणितां सिताञ्च ॥ ॥ ४१ ॥ लिह्यात्प्रभाते श्वसने च कासे प्लीहारुचौ पीनसच्छ- र्द्दिहिक्काम् ॥ शोफातिसारं ग्रहणीं च पाण्डुं क्षयं निहन्यात्क्षतजं च यक्ष्मम् ॥ ४२ ॥ तालीसपत्र १, मिरच २, सोंठ ३, पीपल ४ इनको यथोत्तर वृद्धिभागसे ले और दालचीनी, तेजपात, लौंग, इलायची इनको मिला और पीपलसे आठगुनी मिसरी मिला ॥ ॥ ४१ ॥ फिर प्रभातसमयमें खानेसे श्वास, खांसी, प्लीह अर्थात् तिल्ली, अरुचि, पीनस, छर्दि, हिचकी, शोजा, अतिसार, संग्रहणी, पांडु रोग इन रोगोंका नाश होता है और चोटसे उपजा क्षय, राजयक्ष्मा इनको नाशता है ॥ ४२ ॥

अ० १२ ] भाषाटीकासमेता । ( ३२१ ) अथ बृहत्तालीसाद्य औषध । तालीसं त्रिफलाप्रियङ्गुमगधामूलञ्च मुस्ता शटी दाव्यैलादल- नागकेसरलवङ्गानां तथा नागराः ॥ कृष्णाकोलकबालकं सच- विला मूर्वा विषा कर्कटं द्राक्षा कुष्ठनिशाम्विवत्सकवृषं गोकण्ट- तिक्ता तथा ॥ ४३ ॥ वृक्षाम्लं च सदाडिमाम्लकरसं पक्कं बद- र्याः फलं चैतेषां समभागचूर्णविहितं योज्या समा शर्करा ॥ योज्यं चार्द्धपलं निहन्ति क्षतजं कासं तथा श्वासकं पाण्डुं कामलमेदशोषगुदजे शस्तं सदा यक्ष्मिणाम् ॥ ४४ ॥ तालीसपत्र, त्रिफला, गोंदी, पीपलामूल, नागरमोथा, कचूर, देवदार, इलायची, तेजपात, नागकेशर, लौंग, सोंठ, पीपली, कंकोल, नेत्रवाला, चव्य, मूर्वा, अतीश, काकड़ासिंगी, दाख, कूठ, दारुहलदी, चीता, कूड़ाकी छाल, बांसा, गोखरू, कुटकी ॥ ॥ ४३ ॥ बिजौरा, अनारदाना, पके हुए बेर इनको समान भाग ले चूर्ण बनावे और सब चूर्णके समान खांड मिलावे, इस चूर्णको आधा तोला प्रमाण खावे । यह क्षतसे उपजी खांसी, श्वास, पांडुरोग, कामला, मेद, शोष, गुदाके रोग, राजयक्ष्मा इन रोगोंको नाशता है ॥ ४४ ॥ मधुयष्टिका हिता प्रोक्ता क्षये कासे त्रिदोषजे ॥ क्षयसे उपजी हुई खांसीमें और त्रिदोषसे उपजी हुई खांसीमें मुलहटीका सेवन करना हित है ॥ आमजे शूलरोगार्त्तिः पर्वभेदो भ्रमः क्लमः ॥ शोषः शिरोव्यथा क्लेदो नेत्रे गम्भीरमिच्छति ॥ ४५ ॥ आमसे उपजी हुई खांसीमें शूलरोगकी पीडा, संधियोंका भेद, भ्रम, ग्लानि ये होते हैं और शोष हो, शिरमें पीडा हो, ग्लानि हो, नेत्र गंभीर हों ये लक्षण हो जाते हैं ॥ ४५ ॥ अथ छर्दिलक्षण । खल्ली वा चेतनं वापि अजीर्णाज्जायते वमिः॥सापि स्निग्धा च रूक्षा च द्विविधा जायते वमिः॥४६॥ गम्भीरनेत्रो वमते विड्- बन्धो वाति सार्य्यते ॥ गात्रे खल्लीकरं शूलं तथा शोथाति- मूर्च्छना ॥४७॥ विकलाङ्गो भ्रमार्त्तश्च भ्रमन्तं पश्यते जगत् ॥ शिरोऽर्त्तिर्वेपतेऽत्यर्थं करपादौ हिमोपमौ ॥४८॥ एतैर्लिङ्गैस्तु २१

( ३२२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- संयुक्तां छर्दिं दूरे परित्यजेत् ॥ असाध्या सर्वयोगैस्तु साप्यजीर्णा सुधीमता ॥ ४९ ॥ अजीर्णसे, वमन होनेसे खल्लीरोग हो जावे, मूर्च्छा हो जावे और वमन भी स्निग्ध, रूक्ष ऐसे दो प्रकारकी होती हैं ॥४६॥ जिसके गंभीर नेत्र हों और वमन करे, विष्ठा बन्ध हो, अतिसार हो और शरीरमें खल्ली रोग हो, शूल हो, शोजा हो, अतिमूर्च्छा हो ॥४७॥ अंग विकल हो, भ्रमकी पीडा हो, जगतको भ्रमताहुआ देखे, शिरमें पीडा हो, कांपन हो, हाथ पैर ठंढे हों ॥४८॥ इन लक्ष- णोंसे युक्त जो वमन हो उसको दूरसे ही त्याग देवे और सब योगों करके यह असाध्य है अजी- र्णसे उपजी कहाती है ॥ ४९ ॥ अथ वातच्छर्द्दिकी चिकित्सा । सपञ्चमूलीकथितः कषायः ससैन्धवं चामलकञ्च कल्कः ॥ क्वाथं पिबेन्मिश्रितपिप्पलीकं छद्देश्च वातस्य निवारकञ्च॥५०॥ दद्यात्क्षीरं शर्कराभिर्नरस्य पित्तोद्भूतां वातिशीघ्रं निहन्ति ॥ द्राक्षा वापि क्षीरदाव्यर्या विचूर्णं लेहो हन्ति सारघाणां पिबन्ति॥ ॥५१॥ फलत्रिकं पुष्करकं वचां च तथाभयासैन्धवकं गुडेन ॥ चूर्णं विलिह्यात्कफवान्तिमत्ति नरस्य मूत्रेण युतस्य पानम् ॥ ॥ ५२ ॥ शटी दार्व्यभया शुण्ठी मागधी घृतसंयुता ॥ चूर्णं तक्रेण संयुक्तं हन्ति छर्दिं त्रिदोषजाम् ॥५३॥ रक्तशाल्युद्भवा लाजा मधुशर्करयान्विता ॥ ज्वरात्तिं युवतेः शीघ्रं नाशयंत्येव मे मतम् ॥५४॥ आमलक्या रसेनाथ घृष्टं चन्दनकं मधु ॥ गुटिका पलमानेन लेहो हन्ति वमिं ध्रुवम् ॥५५॥ आर्द्रदाडि- मनिर्यासाश्चाजाजी शर्करान्विता ॥ सतैलं माक्षिकं वापि चत्वारः कवलग्रहाः ॥ ५६ ॥ वाताद्यद्वन्द्वजांश्छर्दीन्निहन्त्येव न संशयः ॥ ५७ ॥ त्रिकटुकरजनीद्वयं च फलत्रिकं मध्वा च यावशूकञ्च ॥ समकृतमिति चूर्णमेतन्मधुना युतं वमिं निवार- यति ॥ ५८ ॥ सगुडं दाडिमद्राक्षापथ्यागुडनागरैर्युक्ता ॥ त्रिवृता नागरमथवा गुडेन युक्तं वमिं दहति ॥ ५९ ॥

अ० १२ ] भाषाटीकासमेता । ( ३२३ ) लघुपंचमूलका क्वाथ बना उसमें सैंधानमक, आंवला, इनका कल्क बना और पीपल मिला इस क्वाथके पीनेसे वातसे उपजी छर्दि दूर होती है ॥ ५० ॥ और दूधमें खांड मिला पीनेसे पित्तसे उपजी छर्दि शीघ्रही नष्ट होती है और दाख, क्षीरविदारी इनके चूर्णका सारघ शहतमें लेह बना पीनेसे पित्तछर्दिका नाश होता है ॥ ५१ ॥ और त्रिफला, पोहकरमूल, चच, हरड़ै, सैंधानमक इनका चूर्ण बना गुड़में मिला चाटनेसे कफकी छर्दि दूर होती है और जिसके ज्यादे मूत्र उतरता हो उसको भी इसीका पीना श्रेष्ठ है ॥ ५२ ॥ और कचूर, देवदार, हरड़ै, सोंठ, पीपल इनके चूर्णको घृतमें अथवा तक्रमें मिला खानेसे त्रिदोषसे उपजी छर्दि दूर होती है ॥ ५३ ॥ और शालीचावलोंकी खीलोंमें शहद और खांड मिला खानेसे शीघ्र ही ज्वरकी पीडाका नाश होता है ॥ ५४ ॥ आंवलाके रसमें चंदनको घिस तिसमें शहद मिला आंवलाके प्रमाण गोली बांधलेवे । यह लेह वमनको निश्चय नाशता है ॥ ५५ ॥ अदरखका रस, अनारदानाका रस, जीरा, खांड, तैल, शहद इनके कवलग्रह अर्थात् ग्रास बनाके मुखमें धारण करे ॥ ५६ ॥ इस ग्रासोंके धारण करनेसे वात आदिक दोषोंसे उपजीहुई तथा दोदोषोंसे उपजी हुई और तीन दोषोंसे उपजीहुई वमन दूर होती है ॥ ५७ ॥ और सोंठ, मिरच, पीपल, हलदी, दारुहलदी, त्रिफला, मदिरा, जवाखार, इनको समान भागले चूर्ण बना शहदमें खानेसे छर्दिका निवारण होता है ॥ ५८ ॥ और अनारदाना, दाख, इन्होंको मिला अथवा हरड़ै, सूंठ, इनको गुड़ मिलाय अथवा निशोथ, सूंठ इनको गुड़में मिला खानेसे वमन दूर होती है ॥ ५९ ॥ अथ पित्तकी छर्दिको चिकित्सा । पर्पटं सगुडं क्वाथं शीतलं पाययेन्नृणाम्॥हन्ति वमिं महाघोरां सपित्तां अस्रसंयुताम् ॥६०॥ काकोली काकमाची च क्वाथं शर्करया युतम्॥लाजाशर्करसंयुक्तं हंति पित्तवमिं नृणाम् ६१॥ मातुलुङ्गरसश्चैव पथ्या शर्करया युतः ॥ हन्ति कासं पित्तभवं वमिं शीघ्रं नियच्छति॥६२॥हृद्वा पित्तवमिं घोरां सदाहभ्रम- दायिनीम् ॥ तस्यारग्वधपत्राणि मधुशर्करयान्वितम् ॥६३ ॥ क्षीरपानं प्रशस्तं वा मुस्ताशर्करयान्वितम् ॥ ६४ ॥ पित्तपापडा,गुड़ इनका क्वाथ बना शीतलकर मनुष्योंको पिलानेसे पित्तसहित और अस्रसहित महाघोर वमन दूर होती है ॥ ६० ॥ काकोली, मकोह, इनका क्वाथ बना उसमें खांड मिला पीनेसे अथवा धानकी खीलोंके रसमें खांड मिला पीनेसे पित्तकी छर्दि दूर होती है ॥ ६१ ॥ बिजौराके रसमें हरड़ैका चूर्ण और खांड मिला पीनेसे पित्तसे उपजी खांसी और वमन दूर

( ३२४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-

होती है ॥ ६२ ॥ दाह तथा भ्रमवाली घोर पित्तकी छर्दिको देखि तहां अमलतासके पत्तोंकें रसमें शहद और खांड मिला पीना ॥ ६३ ॥ तथा नागरमोथा, खांड ये मिला दूधका पीना श्रेष्ठ कहां है ॥ ६४ ॥ अथ कफकी छर्द्दिकी चिकित्सा । जम्बूवाम्रकप्रवालानि दाडिमामलकं तथा॥ मस्तुनापोषितं पानं हन्त्याच्छ्लेष्मवमिं नृणाम् ॥६५॥ सर्ज्जार्जुनंधवकदम्बकलोलचूर्णं धान्याकशुण्ठिसहितं सगुडं प्रदद्यात् ॥ श्लेष्मोद्भवं वमनमाशु निहन्ति पुंसां लेहस्तथा मधुकणाक्रिमिहाशटीनम् ॥ ६६ ॥ जामुन, आंब इनके कोमल पत्ते, अनारदाना, आंवला, इनको दहीके मस्तुमें पीस पीनेसे मनुष्योंको कफसे उत्पन्न हुई छर्दि दूर होती है ॥ ६५ ॥ और रालवृक्ष, अर्जुनवृक्ष, धव कदंब, कंक़ोल, सूंठ, धनियां इनका क्वाथ बना गुड़ मिला पीनेसे कफसे उपजी छर्दि दूर होती है और कचूर, पीपल, शहद, वायविडंग इनका अवलेह बना चाटना हित है ॥ ६६ ॥ अथ एलादिचूर्णं । एलालवङ्गगजकेसरकोलसर्ज्जालाजाप्रियङ्गुघनचन्दनपिप्पली- नाम्॥चूर्णानि मार्कवसितासहितानि लीह्वा छर्दि निहन्ति कफ- मारुतपित्तजाञ्च॥६७॥एलादलानि गजकेसरकत्वगेलालाम- ज्जकं च दहनं च घनं प्रियङ्गुम्॥सचन्दनं मगधजासमचूर्णितञ्च लीह्वा सितासमत्रिदोषवर्मि जघान ॥ ६८ ॥ इलायची, लौंग, नागकेसर, चव्य, रालवृक्ष, धानकी खील, गोंदी, नागरमोथा, चन्दन, पीपल, भांगरा इनके चूर्णमें मिसरी मिला चाटनेसे कफवात पित्त इन दोषोंसे उपजी हुई छर्दि दूर होती है ॥ ६७ ॥ और इलायचीके पत्ते, नागकेशर, दालचीनी, इलायची, रोहिषतृण, चीता, नागरमोथा, गोंदी, चंदन, पीपल इनको समानभाग ले चूर्ण बना मिश्री मिला खानेसे त्रिदोषसे उपजी छर्दिका निवारण होता है ॥ ६८ ॥ अथ छर्दीकी शमनक्रिया । उर्ध्वभागगते दोषे रेचनं तु प्रशस्यते॥ तस्मिञ्झातेऽप्यधोभागं वमनं शाम्यति ध्रुवम् ॥६९॥ अथवा द्विभागगते तदा देया- भया मधु ॥ क्रिमिजं वमनं ज्ञात्वा क्रिमीणां शमनक्रिया ७० वमन व खांसीमें जो दोष उर्ध्वभागोंमें स्थित हो तो जुलाब दिवानी चाहिये और जो

मं० १३ ] भाषाटीकासमेता । ( ३३५ ) अधोभागमें अर्थात् नीचेके स्थानोंमें दोष प्राप्त होवें तो वमन कराना श्रेष्ठ है ॥ ६९ ॥ और जो नीचे तथा ऊपर दोनों भागोंमें दोष स्थित हों तो हरडै, शहद देने चाहिये और कृमियोंसे उपजे वमनको जानके क्रिमियोंको शांत करनेवाली क्रिया करनी चाहिये ॥ ७० ॥ अथ छर्दिरोगमें पथ्यापथ्य । न चोष्णं नातिचाम्लं च न तीक्ष्णं न तथा लघु॥तण्डुलीय- कशाकं वा न मद्यं काञ्जिकं न तु॥७१॥ वमिदोषे च कथितं पथ्यं चात्र शृणुष्व मे ॥ अनूपं शालिभक्तं च शतपुष्पा च वास्तुकम् ॥७२॥ आढकी मुद्गयूषञ्च दधि गुडघृतान्वितम् ॥ अंगारमण्डका चाथ वमौ पथ्यं प्रशस्यते ॥ ७३ ॥ यथाबलं यथाकालं यथारोगं यथानलम्॥तथा दृष्ट्वा प्रकुर्वन्ति पथ्यानां समुपक्रमम्॥७४॥ दिवा निद्रां प्रयुञ्जीयाद्वमौ श्वासेऽतिसा- रके॥हिक्काशोषे तथाजीर्णे वमिक्लेदेऽथवा पुनः ॥ ७५ ॥ न चोष्णतोयपानञ्च नातिभोजनमेव च ॥ न धावनं न कर्त्तव्यं वर्जयेद्वमनार्दिते ॥७६॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीय- स्थाने छर्दिचिकित्सा नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ गरम, अत्यंत खट्टा, तीक्ष्ण तथा हलका, चौलाईका शाक, मदिरा, कांजी इनको वमन रोगमें नहीं खावे ॥ ७१ ॥ अब वमनमें पथ्य कहते हैं सुनो । अनूपदेशके जीवोंका मांस, शालिसंज्ञक चावल, सोंफ, बथुवा ॥७२॥ तुरीधान्य, मूंगोंका यूष, दही, गुड़, घृत, अङ्गारोंमें सेके हुंए मांडे ये वमनमें भोजन करने श्रेष्ठ हैं ॥७३॥ जैसा बल हो जैसा समय हो जैसा रोग हो जैसी जठराग्नि हो तैसे ही पथ्य भोजनोंको विचारके देवे ॥ ७४ ॥ वमन, श्वास, अतीसार इन रोगोंवाले पुरुषों- को दिनमें सुवावे और हिचकी, शोष, अजीर्ण, वमन, ग्लानि इन रोगोंमें भी दिनमें सोना श्रेष्ठ है ॥ ७५ ॥ गरम जल नहीं पीवे, ज्यादे भोजन नहीं करे और वमनसे पीड़ित पुरुषको दांतून नहीं करनी चाहिये ॥ ७६ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिता- भाषाटीकायां तृतीयस्थाने छर्दिचिकित्सानाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ त्रयोदशोऽध्यायः १३. अथ तृषा और तालुशोषकी संप्राप्ति । आत्रेय उवाच ॥ भयश्रमाद्गलहीनाद्विदलारूक्षसेवनात् ॥ आतपे

( ३२६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- वा ज्वरे जीर्णे क्षयाच्च क्षतजातथा ॥ १ ॥ एतैः संकुपिता दोषा वातपित्तकफास्त्रयः॥ चतुर्थी क्षतजा प्रोक्ता पञ्चमी क्षयजा स्मृता ॥ २ ॥ अजीर्णात्षष्ठी संप्रोक्ता सप्तमी रूक्षसेवनात् ॥ अष्टमी स्याज्ज्वरोत्पन्ना लक्षणानि शृणुष्व मे ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-भय, श्रम, बलकी हीनता इनसे, विदल संज्ञक अर्थात् कुलथी आदि अन्नको सेवनेसे, घामसे और ज्वरसे, अजीर्ण और क्षतसे तथा क्षयसे ॥ १ ॥ इनसे कुपित हुए वातपित्त कफसे तीन प्रकारकी तृषा होती है और घावके होनेसे चौथी और क्षयसे उपजी पांचवीं तृषा होती हैं ॥ २ ॥ अजीर्णसे छठी और रूक्षपदार्थको सेवनेसे सातवीं और ज्वरसे उपजी आठवीं ऐसे तृषा कही हैं उनके लक्षणको मुझसे सुनो ॥ ३ ॥ अथ वातआदि दोषोंसे उपजी तृषाके क्रमसे लक्षण । क्षामः श्यावास्यता चाथ वैरस्यं वेपथुस्तथा ॥ वातेन सा भवे- त्तृष्णा विज्ञेया भिषजां वरैः॥४॥शीततोयाभिलाषश्च भ्रमदा- हप्रलापतः ॥ मूर्च्छा च लोहिते नेत्रे तृष्णा पित्तोद्भवा मता ॥ ॥५॥ निद्रा श्यावास्यतालस्यं बलासोषणाभिलाषता ॥ घन- श्यावांगशैत्यं च श्लेष्मणो जायते तृषा ॥ ६ ॥ कृश शरीर हो जावे और मुख काला हो जावे,मुखमें स्वाद आवे नहीं और कंप उपजे ये लक्षण होवें तब वातकी तृषा जाननी ॥ ४ ॥ शीतल पानीकी इच्छा रहे, भ्रम, दाह, प्रलाप, ये उपजे, मूर्च्छा हो, नेत्र लाल होजावें तब पित्तकी तृषा जाननी ॥५॥ नींद हो,मुख काला हो, कफ पडे, गरम चीजकी इच्छा रहे, कठिन और काला और शीतल ऐसा अंग होजावे तब कफकी तृषा जाननी ॥ ६ ॥ अथ त्रिदोषकी तृषाका लक्षण । दृक्शूलं वमते दाहो भ्रमो वा शिरसो व्यथा ॥ वेपथुश्चाङ्गशैत्यञ्च त्रिदोषप्रभवा तृषा ॥ ७ ॥ नेत्रोंमें शूल चले, छर्दि आवे, दाह और भ्रम हो, शिरमें पीड़ा रहे, कंप हो, अंगोंमें शीत- लता हो, तब त्रिदोषकी तृषा जाननी ॥ ७ ॥ अथ अन्यतृषाओंके लक्षण । वक्त्रशोषो भवेज्जृम्भा शिरोऽर्त्तिर्गुरुतोदरे॥अजीर्णेनाथ मनुजे तृष्णा संलक्ष्यते गदः ॥८॥ रसक्षये यदा तृष्णा तथाक्षमक्षुधा-

तुरः ॥ ग्लानिः शोषो भ्रमः श्वासो दैन्यमाशु प्रवर्त्तते ॥ ९ ॥ क्षतक्षयेषु या तृष्णा तस्यां नान्‍नाभिनन्दनम् ॥ अन्या ज्वरात्तुरे प्रोक्ता तृष्णा सा ज्वरवेगजा ॥ १० ॥ अन्यातिसारे शूूले वा तृष्णा ज्ञेया भिषग्वरैः ॥ ११ ॥ मुखमें शोष हो और जँभाई आवे, शिरमें पीड़ा हो, पेट भारी रहे तब अजीर्णकी तृषा जाननी ॥ ८ ॥ शरीर कृश हो, भूखसे पीडित रहे, ग्लानि, शोष, भ्रम, दीनपना ये शीघ्र उपजें तब रसके क्षयसे उपजी तृषा जाननी ॥९॥ घावसे उपजी तृषामें अन्नमें रुचि न हो, ज्वररोगवालेके ज्वरके वेगसे उपजी तृषा होती है ॥ १० ॥ अतीसारसे और शूलसे भी उपजी तृषा जाननी ॥ ११ ॥ अथ असाध्यतृष्णाका लक्षण । तृष्णातिसारवमनदाहमूर्च्छाभ्रमशोषोद्भवा ॥ तोयेन न याति तृप्तिमसाध्यां तां विजानीहि ॥ १२ ॥ अतीसार, छर्दि, दाह, मूर्च्छा, भ्रम, शोष इनसे उपजी जो तृषा पानीसे शांत नहीं होवे, तब वह असाध्य जाननी ॥ १२ ॥ अथ वातकी तृषाकी चिकित्सा । तृष्णां वातोद्भवां दृष्ट्वा शस्यते सगुडं दधि॥सगुडं वामृताक्वा- थ पीतं वाततृषापहम् ॥ १३ ॥ शुण्ठी च जीर्णा सह शृङ्गवेरं जलेन सौवर्चलयुक्तकल्कः ॥ पिबेत्कषायं च सुशीतलं वा वातोद्भवां चाशु निहन्ति तृष्णाम् ॥ १४ ॥ वातकी तृषा देख गुड़सहित दही हित है अथवा गिलोयके क्वाथमें गुड मिला पीवे । यह बातकी तृषा शांत होती है ॥ १३ ॥ सूंठ, जीरा, अदरख, कालानमक इनका पानीसे पीस कल्क बनावे अथवा क्वाथ बना पीनेसे बातकी तृषा शांत हो जाती है ॥ १४ ॥ अथ पित्तकी तृषाकी चिकित्सा । काश्मर्यं पद्मकोशीरं द्राक्षा मधुकचन्दनम् ॥ वालकं शर्करायु- क्तं क्वाथं पित्ततृषापहम् ॥ १५॥ वटद्रुमो रोध्रसिता च चन्दनं सदाडिमं तण्डुलधावनेन ॥ पिष्ट्व च शीतेन जलेन वापि पीतं च पित्तोत्थतृषापहञ्च ॥ १६ ॥ कुष्ठमुत्पललाजां च न्यग्रोधस्य प्ररोहकान् ॥ संचूर्ण्य शर्करायुक्ता गुटिका तृणिवारणी ॥१७॥

( ३२८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-

द्राक्षोत्पलं सयष्टीकं शस्तं चेक्षुरससेवनात् ॥ पीतं पित्तोद्भवां तृष्णां हन्ति दाहञ्च पित्तजम् ॥ १८ ॥ आकण्ठं शर्करायुक्तं तथा क्षीरं पिबेन्नरः॥ वमनञ्चतदा कुर्याद्धन्ति तृष्णां सपैत्ति- कीम् ॥ १९ ॥ लोष्टप्रतप्ततोयञ्च निर्वाप्य शीतलं कृतम् ॥ पिबेत्तृष्णाविनाशाय जलं वा चन्दनान्वितम् ॥ २० ॥ कंभारी, कमल, खस, दाख, मुलहटी, चंदन, नेत्रवाला इनके क्वाथमें खांड़ मिला पीवे यह पित्तकी तृषाको हरता है ॥ १५ ॥ वडके कोंपल, लोध, मिश्री, चंदन, अनारदाना इनको चावलोंके पानीसे अथवा शीतल पानीसे पीस पीवे । यह पित्तकी तृषाको हरता है ॥१६॥ कूठ,नीला- कमल, धानकी खील, वडकी कोंपल इनके चूर्णमें खांड मिला गोली बांधै । ये गोली पित्तकी तृषाको हरती है ॥ १७.॥ दाख, नीलाकमल, इनका और मौरेठीका चूर्ण अथवा ईखका रस सेवनेसे पित्तकी तृषा और पित्तका दाह शांत होता है ॥ १८ ॥ खांडसे युक्त किये दूधको कंठतक पीवे पीछे वमन करे तब पित्तकी तृषा शांत होती है ॥ १९ ॥ जलीहुई माटीको या राखको, लोहको या वाळूरेतको गरम कर पानीमें बुझावे पीछे शीतल कर पीवे अथवा चंदनसे युक्त किये पानीको पीवे तब पित्तकी तृषा शांत होती है ॥ २० ॥ अथ कफकी तृषाकी चिकित्सा । जम्ब्वाम्रकप्रवालानि तथा लाजा च चन्दनम् ॥ धातकीकुसु- मानि स्युः पिष्ट्वासारसंयुतः ॥२१॥ ॥ श्लेष्मतृष्णापहो लेहो दाहमूर्च्छाभ्रमापहः ॥ पिबेच्चाढकीयूषञ्च लाजाशर्करयान्वितम् ॥२२॥ क्षीरपानं समरिचं जलं वा मरिचान्वितम् ॥ श्लेष्म- तृष्णाविनाशाय पिबेद्वा कोलकं पयः ॥ २३ ॥ जामुन और आंबकी कोंपल, धानकी खील, चंदन, धवके फूल इनको वांसाके रसमें पीस चाटे । यह अवलेह कफकी तृषा, दाह, मूर्च्छा, भ्रम इनको नाशता है ॥ २१ ॥ धानकी खीलोंसे संयुक्त किये अरहरके यूषमें खांड़ मिला पीवे अथवा मिरचोंसहित दूधको पीवे ॥ २२ ॥ अथवा मिरचोंसहित पानीको पीवे अथवा वड़वेरीके पत्तोंके रसको पीवे तब कफकी तृषा नष्ट होजाती है ॥ २३ ॥ अथ त्रिदोषकी तृषाकी चिकित्सा । दुरालभा पर्पटकं प्रियङ्गु लोध्रद्रुमं त्र्यूषणकं सकुष्ठम् ॥ क्वाथः सुशीतो मधुशर्करायास्तृष्णां त्रिदोषप्रभवां निहन्ति ॥ २४ ॥

अ० १३] भाषाटीकासमेता। (३२९) कालदाडिमवृक्षाम्लाः सारिवा समशर्करा ॥ पथ्या दाडिमचूर्णं वा मातुलुङ्गरसान्वितम् ॥ २५ ॥ जवासा, पित्तपापडा, कांगनी, लोध, सूंठ, मिर्च, पीपल, कूट इनके काथको शीतल बन उसमें शहद और खांड़ मिला पीवे यह त्रिदोषकी तृषाको नष्ट करता है। कालाअनार, वृक्षाम्ल और सारिवा इनके समान भाग शर्कराका चूर्ण खावे अथवा सूंठ और अनारका चूर्ण बिजौराके रसके साथ खावे ॥ २५ ॥ अथ तालुशोषकी चिकित्सा। काष्ठपात्रे शृतं सम्यक्शीतलं सलिलं तथा ॥ मर्दितं बहुवेलां तु तत्पानीयंच पाययेत् ॥ २६ ॥ तालुशोषे घृतं तच्च दापयेच्च भिषग्वरः॥तृष्णादाहभ्रमच्छर्दिशोषमूर्च्छा व्यपोहति ॥ २७ ॥ क्षतजां क्षयजां तृष्णां वारयत्याशु निश्चितम् ॥ २८ ॥ गरम किये पानीको काष्ठके पात्रमें घाल बहुत देरतक मर्दितकर पीवे ॥ २६ ॥ और उसी पानीमें घृतको सिद्धकर वैद्य तालुशोषमें देवे यह तृषा, दाह, भ्रम, छर्दि, शोष, मूर्च्छा इनको नाशता है ॥ २७ ॥ क्षतसे और क्षयसे उपजी तृषाको शीघ्र दूर करता है ॥ २८ ॥ अथ दाडिमकोल । दाडिमं कोल चुक्रीका वृक्षाम्लं चाम्लवेतसम् ॥ रसं चैव तथा पथ्यायुक्तं तालुप्रलेपनम् ॥ २९ ॥ अनार, बेर, चूका, बिजौरा, अम्लवेतसके रसमें हरडेका चूर्ण मिला तालूपर लेप करै ॥ २९ ॥ अथ तृष्णाआदिकोंकी साधारण चिकित्सा । वारयत्याशु शोषं च तृष्णां हन्ति च सज्वराम्॥केसरं मातुलु- ङ्गस्य पिष्टं तण्डुलवारिणा ॥३०॥ प्रतप्तमधुना तालुलेपो मुख- शोषापहः ॥ मधुशर्करया तालुलेपो शोषनिवारणः ॥ ३१ ॥ पद्मकन्दशृतालेपः शीतः शीतलवारिणा ॥ तालुशोषं निह- न्त्याशु जम्ब्वाम्रपल्लवानि च ॥ ३२ ॥ निम्बान् वा मातुलु- ङ्गान् वा सौवीरं नागराणि च ॥ तृषार्त्तपुरतो भक्ष्यन्न देयं तस्य धीमता॥३३॥ दर्शनात्तस्य चास्ये च लाला प्रस्रवते भृशम् ॥

( ३३० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- तेनास्य शोषं हरति तृष्णामपि नियच्छति ॥३४॥ रक्तशाल्यो- दनं शस्तं दधिशर्करयान्वितम्॥भोजनञ्च प्रशस्तं च न क्षारं कटुकं पुनः॥३५॥शोषे च च्छर्दितृष्णायां श्रमे पानात्ययेऽपि च॥अतीसारे च शोषे च दिवा निद्रा सुखावहा ॥३६॥ इत्या- त्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने तृष्णालुशोषचिकित्सा नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ विजौराकी केशरको चावलोंके पानीसे पीस पीनेसे तालुशोष और ज्वरसहित तृषा शांत होती है ॥ ३० ॥ गरम किये शहदसे तालुपर लेप करे यह मुखशोषको नाशता है, शहद और खांडसे तालुपर लेप करे यह मुखके शोषको दूर करता है ॥ ३१ ॥ कमल कंदको शीतल पानीसे पीस लेप करे अथवा जामन और आंबके पत्तोंको पीस लेप करे तब तालुशोष शांत होता है ॥ ३२ ॥ नींबू, विजौरा, कांजी, सूंठ, इनको इस रोगवालेके आगे खावे परंतु उस रोगीको नहीं देना ॥ ३३ ॥ इनके देखनेसे रोगीके मुखमें अत्यंत लाल झिरने लगती है उससे तृषा और शोष दूर होता है ॥ ३४ ॥ दही और खांडसे संयुक्त किये लाल शालिचावल इसरोगमें भोजन करने श्रेष्ठ हैं, खारा और चरचरेको फिर नहीं खावे ॥ ३५ ॥ शोष, छर्दि, तृषा, परिश्रम, पानात्यय इन रोगोंमें दिनकी नींद सुखको देती है ॥ ३६ ॥ इति वेरिनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने तृषातालुशोषचिकित्सानाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ चतुर्दशोऽध्यायः १४. अथ मूर्च्छाकी संप्राप्ति । आत्रेय उवाच॥वेगाभिघातातिनिरोधकेन क्षीणक्षताच्च तृषि- तेन वापि॥विरुद्धयुक्तान्नविभक्षणेन दोषःप्रदुष्टःप्रकरोति मूर्च्छा म्॥१॥ पञ्चेन्द्रियाणां संलग्नाः प्रत्येके द्वादशादयः ॥ पञ्चे- न्द्रियाणां सहिता नाडिकाः षष्टिसंख्यया॥२॥रुन्धंति नाडि- काद्वारं तेन चेतो विमूर्च्छति॥संज्ञानाशाद्भवेच्छीघ्रं निश्चेताश्च सदा नरः॥३॥पतति काष्ठवत्तूर्णं मोहोन्मूर्च्छा निगद्यते ॥ सा षड्विधा समुद्दिष्टा वातपित्तकफात्तथा॥४॥ शोणितादभिघा-

तन मद्येनाथ विषेण वा॥एतेषां कोपयेत्पित्तं मरुद्रक्तं समीरि- तम् ॥५॥ संख्यादौर्बल्यकं तेन मूर्च्छा मोहःप्रकथ्यते ॥ कथ- यामि समासेन लक्षणानि पृथक्पृथक् ॥ ६ ॥ आत्रेय कहते हैं-विषयआदि वेगके अभिघातसे,मूत्रआदिको रोकनेसे, क्षीण छतसे, तृषाकी पीडासे, विरुद्ध अन्नको सेवनेसे दुष्टहुआ वातआदि दोष मूर्च्छाको करता है ॥ १ ॥ अलग २ बारहनाड़ी पांचों इन्द्रियोंमें लगीहुई हैं एसे साठ नाड़ी जाननी ॥ २ ॥ जब दुष्ट हुए दोष नाड़ियोंके द्वारको रोकते हैं तब मनुष्य मूर्च्छाको प्राप्त होते हैं । संज्ञाके नाश होनेसे शीघ्रही जड़रूप मनुष्य होजाता है ॥ ३ ॥ और काष्ठकी तरह मनुष्य शीघ्र गिर पड़ता है उसको मोहमूर्च्छा कहते हैं वह छःप्रकारकी कही है ॥ ४ ॥ वातकी, पित्तकी, कफकी, रक्तकी, चोटकी, मदिराकी अथवा विषकी, ऐसे मूर्च्छा हैं। वायु और रक्तसे प्रेरित किया पित्त इन मूर्च्छाओंको कोपित करता है ॥ ५ ॥ ऐसे गिनती है अब इस मोहमूर्च्छाके लक्षणोंको विस्तारसे पृथक् २ कहता हूं ॥ ६ ॥ अथ मूर्च्छाका लक्षण । नीलं कृष्णारुणं पश्येत्तमः प्रविशति क्षणात् ॥ कम्पो मार्दवमेतासां क्षणेन प्रतिबुध्यति ॥ ७ ॥ नीला, काला,लाल ऐसे रंगको देखे और क्षणभरमें अंधेरीको प्राप्त होवे,कंप हो और शरीर शिथिल होजावे और क्षणभरमें जागे ये मूर्च्छाके लक्षण हैं ॥ ७ ॥ अथ वातजआदिमूर्च्छालक्षण । वातेन मूर्च्छा भवति कृशता विकृतास्यता ॥ नेत्रस्रावश्च मृष्टिश्च आध्मानञ्च भवेत्क्षणम् ॥ ८ ॥ शरीर कृश होवे, मुख विकारको प्राप्त हो, नेत्रोंमें पानी झिरे और शरीरमें हड़फूटन होवे और क्षणभरमें पेटपर अफारा हो तब वातकी मूर्च्छा जाननी ॥ ८ ॥ अथ पित्तजमूर्च्छा । पीतञ्च नीलहरितं तमः प्रविशते भृशम् ॥ सन्तापश्च पिपासा च रक्ते पीते च लोचने ॥९॥ सस्वेदं शरीरं चापि श्रमःसंभि- न्नवर्चसाम्॥पित्ताद्भवति मूर्च्छार्तत्वं जायते च शिरोव्यथा॥१०॥ पीला, नीला, हरा ऐसे अंधेरेमें प्राप्त हो, संताप और पिपासा हो, लाल और पीले नेत्र हो जावें ॥ ९ ॥ पसीना आवे, श्रम हो,पतला मल उतरे और शिरमें पीडा हो तब पित्तका मूर्च्छा जाननी ॥ १० ॥

( ३३२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ कफजमूर्च्छा । धूमाकुलां दिशं पश्येत्तमः पश्यति यः पुरः ॥ नेत्राकुलत्वं मन्दाग्निस्तमोऽङ्गेषु च शीतता ॥ ११ ॥ चिरात्प्रबुध्यते- ऽत्यर्थं कण्ठश्च घुर्घूरायते ॥ हल्लासमूर्च्छा भवति कफजा च विलक्षणैः ॥ १२ ॥ धूमासे व्याप्त हुई दिशाको देखे और आगे अंधेरीको देखे, नेत्र व्याकुल होवें,मदाग्नि हो, अंगोंमें भी मन्दपना और शीतलपना हो ॥ ११ ॥ बहुत देरमें जागे, कंठमें घुर्घुर शब्द होवे, थुकथुकी होवे तब कफकी मूर्च्छा जाननी ॥ १२ ॥ अथ सन्निपातजमूर्च्छा । सन्निपातादपस्मारो दृश्यते भिषजांवर ॥ स प्राणिनां घातयति रक्तेन सहितो यदि ॥ १३ ॥ हे वैद्यवर ! सन्निपातसे मृगी रोग दीखता है वह रक्तसे मिलके जीवोंको नाशता है॥१३॥ अथ रक्तगन्धजमूर्च्छा । रक्तगन्धेन मूर्च्छन्ति तेन मूर्च्छा शिरोव्यथा ॥ कम्पते नष्टचेष्टत्वं जलपते वमते पुनः ॥ १४ ॥ रक्तकी गन्धसे उपजी मूर्च्छामें शिरपीड़ा होती है, रोगी कांपता है, चेष्टा नष्ट हो जाती है, ज्यादे बोलता है और वमन करता है ॥ १४ ॥ अथ मद्यादिजन्यमूर्च्छा । विभ्रान्तचेता रक्ताक्षः स्वप्नशीलः सुरावशः ॥१५॥ क्षतक्षया- द्ववेच्चान्या कोद्रवान्ननिषेवणात् ॥ जायते मोहमूर्च्छा च तेन निद्राति दुर्मनाः ॥ १६ ॥ मदिरासे उपजी मूर्च्छामें भ्रमते हुए चित्तवाला और लाल नेत्रोंवाला और शयन करनेको चाहनेवाला ऐसा मनुष्य होजाताहै ॥ १५ ॥ क्षतक्षयसे और कोदूआदि अन्नसे उपजी मूर्छामें अत्यंत नींद आती है और मन बिगड़ जाता ॥ १६ ॥ मूर्च्छा, भ्रम, निद्रा और तंद्रा इन्होंका हेतु । पित्तोत्तमाद्भवति वै मनुजस्य मूर्च्छा पित्तप्रभञ्जनभवं भ्रममेव पुंसाम् ॥वातात्कफात्तमयुता मनुजस्य तन्द्रा निद्रा कफानि- लतमा भजते नरस्य ॥ १७ ॥

अ० १४ ] भाषाटीकासमेता । ( ३३३ ) मनुष्यको पित्तके अत्यंतपनेसे मूर्च्छा होती है और मनुष्योंके पित्त और वातसे उपजा भ्रम होता है, वात और कफसे अंधेरी करके युक्तहुई तंद्रा होती है और कफ वात और तम इनसे ही नींद होती है ॥ १७ ॥ अथ मूर्च्छाकी चिकित्सा । स्वेदाभिषङ्गविधिमर्द्दनवातशान्त्यै शीतान्नपानव्यजनानिलपि- त्तशान्त्यै॥कषायबहुलस्य सदा प्रशस्तं श्लेष्मोद्भवा विनि- हिता भ्रममूर्च्छना वा ॥१८॥ पाययेत्त्रिफलाक्वाथं शीतं शर्क- रया युतम्॥दुरालभायाःक्वाथञ्च पाययेच्छर्करान्वितम्॥१९॥ पसीना, मालिस, मर्दन ये वातकी मूर्च्छामें हित हैं, शीतल अन्न और पान, बीजनाकी पवन ये सब पित्तकी मूर्च्छामें हित हैं, कसेला पदार्थका पान कफकी मूर्च्छामें हित है ॥१८॥ त्रिफलाके शीतलक्वाथमें खांड़ मिला पीवे अथवा जवासाके क्वाथमें खांड़ मिला पीवे ये दोनों क्वाथ मूर्च्छाको हरते हैं ॥ १९ ॥ अथ रक्तमूर्च्छाआदिकोंको उपाय । कणां कोलस्य मज्जाञ्च केशरोशीरचन्दनम्॥पिष्ट्वा शीताम्बुना खण्डपानं हन्ति विमूर्च्छितम् ॥२०॥रक्तजां मूर्च्छनां दृष्ट्वा विधेयः शीतलो विधिः॥क्षयजे दुर्बले क्षीणे मूर्च्छापोषणकार- णम्॥२१॥ नष्टचेष्टात्वमापन्ने नरे संचेतनक्रिया ॥ संपीड्य च नवाङ्गुष्ठं नासिकां च प्रपीडयेत् ॥ २२ ॥ दन्तैर्वा सन्दंशैर्वा- पि शनैर्गात्रं प्रपीडयेत् ॥ दाहयेद्वा ललाटे तु पृष्ठदेशे च भालके ॥ २३ ॥ एवं न सिध्यते वापि तदा चान्दोलनं हितम् ॥ २४ ॥ पीपल, बेरकी मज्जा, नागकेसर, खस, चंदन इनको शीतल पानीसे पीस और खांड मिला पीवे यह मूर्च्छाको नाशता है ॥ २० ॥ रक्तसे उपजी मूर्च्छाको देखके शीतल विधि करनी चाहिये । क्षयवाला, दुर्बल,क्षीण इनके मूर्च्छाकी रक्षाका कारण करना ॥ २१॥ जब मूर्च्छासे मनुष्यकी संज्ञा जाती रहे तब मनुष्यको चेतन करानेकी क्रिया करे. अँगूठेको पीडित कर पीछे नासिकाको पीडित करना ॥ २२ ॥ दांतोंसे अथवा नखआदिसे धीरेधीरे शरीरको पीडित करना अथवा मस्तकमें और पृष्ठभागमें दाग देवे ॥ २३ ॥ जो ऐसे भी सिद्धि नहीं होवे तो आंदोलन क्रिया करनी हित है अर्थात् हिंडोलेसे झुलाना हित है ॥ २४ ॥

( ३३४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ नष्टसंज्ञमूर्च्छितकी चिकित्सा । मूर्च्छातुरं सकलशीतजलेन सिञ्चेत्संवीजयेच्च शिखिपिच्छकवी- जनैस्तु॥दोलायनं हि विहितं मनुजस्य मूर्च्छा मोहं भ्रमञ्च हरते च मदात्ययं वा ॥ २५ ॥ मूर्च्छासे पीडित हुए मनुष्यको शीतल पानीसे सींचे और मोरकी पंखोंके वीजनेसे हवा करे और दोलायन अर्थात् हिंडोलाके द्वारा झुलानेसे मूर्च्छा, मोह, भ्रम, मदात्यय इनका नाश होता है ॥ २५ ॥ अथ मूर्च्छा मद भ्रम इनकी चिकित्सा । करञ्जबीजं सह सैन्धवेन रसोनपत्रस्य रसं च यत्र ॥ मार्कं च पथ्यञ्च वचां जलेन पिष्ट्वाञ्जनं हन्ति दिनस्य तन्द्राम् ॥२६॥ घोटकलालारमरिचं लवणयुतं नेत्रयोरञ्जनं शस्तम्॥ विनिहन्ति दिनशतं तन्द्रां निद्रां वा मानुषस्य ॥२७ ॥ सुगन्धं सुकषा- योपयुक्ता रसस्त्रिफला गुडार्द्रकं प्रातः ॥ सप्ताहान्मधुरजलं हन्ति मदमूर्च्छाकरानुन्मादान् ॥ २८ ॥ रक्तकर्षणमिच्छन्ति मोहमूर्च्छाप्रशान्तये ॥ तस्मादवहितः कुर्य्यात्तासु रक्तावसेच- नम् ॥ २९ ॥ करंजुआके बीज, सेंधानमक, लहसनके पत्ताका रस, भंगरा, हरड़ै, बच, इनको पानीसे पीस अंजन करनेसे तंद्रा दूर होती है ॥ २६ ॥ घोड़ाकी लालोंसे काली मिर्च और सेंधा- नमकको पीस नेत्रोंमें आँजनेसे सौ १०० दिनोंतक मनुष्यकी तंद्रा और नींद दूर हो जाती है ॥ २७ ॥ चंदन, हरड़ै, बहेड़ा, आंवला, गुड़, अदरक इनको प्रभातमें खाके ऊपर मधुर जलको पीनेसे मद और मूर्च्छाको करनेवाले उन्माद दूर होते हैं ॥ २८ ॥ कुशल वैद्य मोह और मूर्च्छाकी शांतिके लिये रक्तको घटाना चाहते हैं इसवास्ते मोह मूर्च्छारोगमें सावधान मनुष्य रक्तको निकसावे ॥ २९ ॥ अथ मूर्च्छादिकोंके साधारण उपाय । शीतसेकावगाहाद्यान्श्रीखण्डं व्यजनानिलान् ॥ शीतानि चान्नपानानि सर्वमूर्च्छासु योजयेत् ॥ ३० ॥ शर्करैक्षुरसद्राक्षा- वातमूर्च्छाप्रपानकैः॥काश्मर्य्यमधुकैरेव पित्तमूर्च्छा जयेन्नरः ॥ ॥ ३१ ॥ यष्ट्याः क्वाथं शृतं सर्पिः शृतं वामलकीरसम् ॥ पिबे-

अ० १५] भाषाटीकासमेता । ( ३३५)

द्रसं सितालाजायुक्तं चोष्णं च शीतलम् ॥३२॥ मधुना हन्ति च मूर्च्छामालेपैश्च प्रबोधयेत् ॥३३॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे तृतीयस्थाने मूर्च्छाचिकित्सा नाम चतुर्दशोऽध्यायः १४॥ शीतल पानीकी सेक, शीतल पानीमें स्नान करना, सफेद चंदन, बीजनाकी पवन, शीतल अन्न और पान ये सब प्रकारकी मूर्च्छामें योजित करने ॥ ३० ॥ खांड, ईखका रस, दाख, इनसे वायुकी मूर्च्छाको दूर करे, खँभारी और मुलहटीसे पित्तकी मूर्च्छाको दूर करे । ॥ ३१ ॥ मुलहटीके क्वाथमें पकाया हुआ घृत अथवा आंवलोंके रसमें धानकी खीलोंका चूर्ण और मिश्री मिला पीवे ॥ ३२ ॥ अथवा शहद मिला पीवे तो मूर्च्छा दूर होती है और मूर्च्छारोगीको सुन्दर आलापोंसे जगाना श्रेष्ठ है ॥ ३३ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्य- नुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

पञ्चदशोऽध्यायः १५. अथ निद्राचिकित्सा ।

आत्रेय उवाच॥दिवा निद्रा तथा तंद्रा धुरिणां नृत्यहास्यभिः। गीतैश्च शान्तिमायाति नात्र कार्या विचारणा॥ यदा रात्रौ न निद्रा स्यात्तदा कुर्य्यादिमां क्रियाम् ॥ १ ॥ काकमाच्यास्तु मूलञ्च शिखां बद्ध्वा भिषग्वरः॥अधोमुखीं शिखां बद्ध्वा निद्रां जनयति निशि ॥ २ ॥ मस्तुना पादतलको मर्दयेन्निद्रया- र्थिनाम् ॥ यस्य नो दिवसे निद्रा तस्य निद्रा निशासु च ॥ ३ ॥ भयचिन्तया च लोभेन या निद्रा न भवेन्निशि ॥ तां चिन्तां च परित्यज्य निद्रा संजायते क्षणात् ॥ ४ ॥ सिंही व्याघ्री सिंहमुखी काकमाची पुनर्नवा॥वार्त्ताकीनां च मूलानां क्वाथो निद्राकरो नृणाम् ॥ ५ ॥ काकजंघा चापामार्गः कोकिलाक्षः सुपर्णिका ॥ क्वाथो निद्राकरः शीघ्रं मूलं वा बन्धयेच्छिखाम् ॥ ६ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने निद्राचिकित्सा नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥