हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- वा ज्वरे जीर्णे क्षयाच्च क्षतजातथा ॥ १ ॥ एतैः संकुपिता दोषा वातपित्तकफास्त्रयः॥ चतुर्थी क्षतजा प्रोक्ता पञ्चमी क्षयजा स्मृता ॥ २ ॥ अजीर्णात्षष्ठी संप्रोक्ता सप्तमी रूक्षसेवनात् ॥ अष्टमी स्याज्ज्वरोत्पन्ना लक्षणानि शृणुष्व मे ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-भय, श्रम, बलकी हीनता इनसे, विदल संज्ञक अर्थात् कुलथी आदि अन्नको सेवनेसे, घामसे और ज्वरसे, अजीर्ण और क्षतसे तथा क्षयसे ॥ १ ॥ इनसे कुपित हुए वातपित्त कफसे तीन प्रकारकी तृषा होती है और घावके होनेसे चौथी और क्षयसे उपजी पांचवीं तृषा होती हैं ॥ २ ॥ अजीर्णसे छठी और रूक्षपदार्थको सेवनेसे सातवीं और ज्वरसे उपजी आठवीं ऐसे तृषा कही हैं उनके लक्षणको मुझसे सुनो ॥ ३ ॥ अथ वातआदि दोषोंसे उपजी तृषाके क्रमसे लक्षण । क्षामः श्यावास्यता चाथ वैरस्यं वेपथुस्तथा ॥ वातेन सा भवे- त्तृष्णा विज्ञेया भिषजां वरैः॥४॥शीततोयाभिलाषश्च भ्रमदा- हप्रलापतः ॥ मूर्च्छा च लोहिते नेत्रे तृष्णा पित्तोद्भवा मता ॥ ॥५॥ निद्रा श्यावास्यतालस्यं बलासोषणाभिलाषता ॥ घन- श्यावांगशैत्यं च श्लेष्मणो जायते तृषा ॥ ६ ॥ कृश शरीर हो जावे और मुख काला हो जावे,मुखमें स्वाद आवे नहीं और कंप उपजे ये लक्षण होवें तब वातकी तृषा जाननी ॥ ४ ॥ शीतल पानीकी इच्छा रहे, भ्रम, दाह, प्रलाप, ये उपजे, मूर्च्छा हो, नेत्र लाल होजावें तब पित्तकी तृषा जाननी ॥५॥ नींद हो,मुख काला हो, कफ पडे, गरम चीजकी इच्छा रहे, कठिन और काला और शीतल ऐसा अंग होजावे तब कफकी तृषा जाननी ॥ ६ ॥ अथ त्रिदोषकी तृषाका लक्षण । दृक्शूलं वमते दाहो भ्रमो वा शिरसो व्यथा ॥ वेपथुश्चाङ्गशैत्यञ्च त्रिदोषप्रभवा तृषा ॥ ७ ॥ नेत्रोंमें शूल चले, छर्दि आवे, दाह और भ्रम हो, शिरमें पीड़ा रहे, कंप हो, अंगोंमें शीत- लता हो, तब त्रिदोषकी तृषा जाननी ॥ ७ ॥ अथ अन्यतृषाओंके लक्षण । वक्त्रशोषो भवेज्जृम्भा शिरोऽर्त्तिर्गुरुतोदरे॥अजीर्णेनाथ मनुजे तृष्णा संलक्ष्यते गदः ॥८॥ रसक्षये यदा तृष्णा तथाक्षमक्षुधा-